Back
कमर अदबी सोसाइटी मुजफ्फरनगर के द्वारा यादें कमर मुशायरा आयोजित
Muzaffarnagar, Uttar Pradesh
काशानाए क़मर केवल पुरी में यादे क़मर मुशायरे का आयोजन किया गया,
अध्यक्षता शमीम किरत पूरी व संचालन अल्ताफ़ मशअल ने किया,पत्रकार ज़फ़र इक़बाल को उनकी उर्दू अदबी सेवाओं को सराहते हुए *निशाने क़मर *से सम्मानित किया गया,
मुख्य अतिथि डॉ सदाक़त देवबन्दी ने उस्ताद शायर हज़रत अब्दुल सलाम क़मर मुज़फ्फ़रनगरी को उन्हीं के मशहूर शेअर
*दुनिया के सामने है तेरा दाग़ेदिल *क़मर*,
*लेकिन निगाह सबकी तेरी रोशनी पे है।*
को और पंक्तियों से विस्तार देते हुए श्रद्धांजलि दी,
हज़रत अब्दुल सलाम क़मर के पुत्र अब्दुल हक़ सहर ने अपनी भावनाओं को ऐसे उजागर किया,
*क़मर ज़ादा हूं लेकिन में,*सहर* हूं,
*यही इक लफ़्ज़ तो पहचान में है।*
इनके अलावा मक़ामी और बाहर के शायरों ने अपनी शायरी से श्रद्धांजलि दी और शायरी पेश की।
*हमारी ज़ात पे दानिस्ता वार होता है,*
*हमारा हर ही फ़क़त सूऐदार होता है।*
अमीर नहटोरी
*मकाने ग़म में हमें शिफ्ट कर गया है कोई,*
*हर इक यक़ीं मगर लिफ्ट कर गया है कोई।* ज़की अंजुम सिद्दीक़ी
*ये क्या किया जो उलझी पहेली पे रख दिया,*
*महका हुआ गुलाब हथेली पे रख दिया।*
सूशीला शर्मा
*में ने इंसान को इंसान से डरते देखा।*
*भाई के हाथ से भाई को ही मरते देखा।*
सिकन्दर देवरियावी
*वफ़ाओं के बदले जफ़ा कर रहा है,*
*वो ग़म से मुझे आशना कररहा है।*
वसीम झिंझानवी
*ओढ़नी भी मिली ना ग़ुरबत में,*
*चादरों में मज़ार रहते हैं।*
अनस आरिफ़
*जाने कब मुल्क की सरहद से सदाआजाए,*
*हर घड़ी हर से कफ़न मेरे बंधा रहता है।*
अमीन मुज़फ्फ़रनगरी
*हैं परिंदों के ठिकाने हम ने बस ये सोचकर,*
*आज तक काटा नहीं है घर वो बूढ़ा शजर।*
हाजी सलामत राही
*हम बज़ाहिर तो अपने घर में रहे,*
*उम्र गुज़री है क़ैद खाने में।*
0
Report
हमें फेसबुक पर लाइक करें, ट्विटर पर फॉलो और यूट्यूब पर सब्सक्राइब्ड करें ताकि आप ताजा खबरें और लाइव अपडेट्स प्राप्त कर सकें| और यदि आप विस्तार से पढ़ना चाहते हैं तो https://pinewz.com/hindi से जुड़े और पाए अपने इलाके की हर छोटी सी छोटी खबर|
Advertisement
0
Report
0
Report
0
Report
0
Report
0
Report
1
Report
30
Report
103
Report
0
Report
0
Report
0
Report
0
Report
0
Report
0
Report