251002शबे-बरात की फज़ीलत: उलेमा-ए-इकराम ने इबादत, तौबा और खामोशी के साथ रात गुज़ारने की अपील की
Muzaffarnagar, Uttar Pradesh:शबे-बरात की फज़ीलत: उलेमा-ए-इकराम ने इबादत, तौबा और खामोशी के साथ रात गुज़ारने की अपील की
आज शबे-बरात के मुक़द्दस मौके पर उलेमा-ए-इकराम ने मुसलमानों से अपील की है कि वे इस बरकत वाली रात को इबादत, तौबा और इस्तेग़फ़ार के साथ गुज़ारें। उन्होंने कहा कि नबी-ए-पाक ﷺ ने इस रात में अच्छे अमाल करने की तालीम दी है।
शबे-बरात के मुबारक मौके पर उलेमा-ए-इकराम ने अपने बयान में कहा कि यह रात अल्लाह तआला की खास रहमत और मग़फिरत की रात है। इस रात नबी-ए-पाक हज़रत मुहम्मद ﷺ ने उम्मत को ज्यादा से ज्यादा नेक अमाल करने, नफली इबादत में मशगूल रहने और अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी मांगने की तालीम दी है।
उलेमा ने कहा कि मुसलमानों को चाहिए कि इस रात में मस्जिदों में भीड़ जमा करने के बजाय अपने घरों में ही इबादत का माहौल बनाएं। नफली नमाज़ अदा करें, कुरआन-ए-पाक की तिलावत करें, तस्बीह और ज़िक्र-ए-इलाही में मशगूल रहें तथा अल्लाह से दुआ करें। उन्होंने यह भी बताया कि पूरी रात जागना ज़रूरी नहीं है, बल्कि जिस किसी को जितना मौका मिले उतनी देर इबादत करे और फिर आराम करके फज्र की नमाज़ बाजमाअत अदा करे, तो उसे पूरी रात की इबादत का सवाब मिलेगा।
उलेमा-ए-इकराम ने बताया कि 15 शाबान की रात में कब्रिस्तान जाना हदीस से साबित है। हज़रत आयशा सिद्दीका रज़ि० फरमाती हैं कि इस रात उन्होंने नबी-ए-पाक ﷺ को जन्नत-उल-बक़ी़ में पाया। इससे मालूम होता है कि इस रात कब्रिस्तान जाना सुन्नत से साबित है, हालांकि भीड़ लगाना या हंगामा करना इस्लामी तरीका नहीं है।
उन्होंने नौजवानों और बच्चों को खास तौर पर नसीहत करते हुए कहा कि बाइक से शोर-शराबा करना, चौराहों पर जमा होना या गैर-ज़रूरी घूमना इस्लाम की तालीम के खिलाफ है। इस मुबारक रात को खामोशी, इबादत और संजीदगी के साथ गुज़ारना चाहिए।
उलेमा ने यह भी बताया कि “बरात” अरबी लफ्ज़ है, जिसका मतलब जहन्नम से आज़ादी है। इस रात अल्लाह पाक ईमान वालों को जहन्नम से आज़ाद करने का फैसला फरमाते हैं। इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह सच्चे दिल से तौबा करे, इस्तेग़फ़ार करे, सदक़ा-ख़ैरात दे और अपनी आख़िरत को बेहतर बनाने की कोशिश करे।
उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई 15 शाबान का रोज़ा रख सके तो यह बहुत सवाब की बात है, क्योंकि हदीसों में इस दिन रोज़ा रखने की फ़ज़ीलत बयान की गई है। आखिर में उलेमा-ए-इकराम ने तमाम मुसलमानों से अपील की कि शबे-बरात को शांति, इबादत और नेक अमाल के साथ गुज़ारें।
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