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Zone-O: दिल्ली की अनधिकृत कॉलोनियों पर लागू डिमार्केशन, क्या नए मकान रुकेंगे?

Delhi, Delhi:दिल्ली में 'ओ-जोन' (Zone-O) यमुना नदी के बाढ़ वाले क्षेत्रों को कहा जाता है. दिल्ली मास्टर प्लान के तहत इसे पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील माना गया है. हाल ही में दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) द्वारा ओ-जोन के बोर्ड लगाए जाने के बाद जगतपुर एक्सटेंशन (बुराड़ी) में तोड़फोड़ की कार्रवाई (डिमोलिशन) शुरू हो गई थी. तो वहीं अब बदरपुर विधानसभा क्षेत्र के हरीनगर, मीठापुर और जैतपुर के लोग भी Zone_O का बोर्ड लगाए जाने के बाद चिंतित है कि कहीं अब अगला नंबर उनके बनाए गए मकान का तो नहीं है. दिल्ली सरकार ने स्पष्ट किया है कि ओ-जोन में शामिल 91 अनधिकृत कॉलोनियों और एक दर्जन से अधिक पुराने गांवों के मौजूदा घरों को नहीं तोड़ा जाएगा. Badarpur जैसी विधानसभाओं में लोगों का आरोप है कि उनकी कॉलोनियां यमुना से काफी दूर (3-5 किलोमीटर) हैं, फिर भी उन्हें कागजों में ओ-जोन में डालकर गलत तरीके से डिमार्केशन किया गया है. वही इस पर जब बदरपुर के विधायक राम सिंह नेताजी से बात किया गया तो राम सिंह नेताजी ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि देखिए जो बदरपुर विधानसभा क्षेत्र का नहर पार का इलाका है हरीनगर, मीठापुर, जैतपुर इसमें तकरीबन 52 कालोनियां है जिसमें 2008 में ओ-जोन लग गया था फिर इसे F-Zone में कर दिया गया था लेकिन फिर हाई कोर्ट में कंप्लेंट करने के बाद फिर इस पर ओ-जोन लग गया 2013 के चुनाव के दौरान इसे F-Zone किया गया था लेकिन उसका नोटिफिकेशन नहीं जारी होने की वजह से ओ-जोन में यह क्षेत्र रह गया हालांकि यह यमुना से बहुत दूर है इसलिए यहां Zone-O का बोर्ड तो लगा हुआ है लेकिन उसमें साफ तौर पर लिखा गया है कि नया निर्माण इस क्षेत्र में नहीं हो सकता इसलिए जो अब तक मकाने बन चुकी है उन पर कोई कार्रवाई नहीं होगी कोई तोड़फोड़ नहीं होगा सिर्फ नई कालोनियां नहीं बसेगी नए मकान नहीं बनेंगे. इसलिए लोगों को किसी भी बात की चिंता नहीं करनी है लोगों को पैनिक नहीं होना है ओ-जोन से नहीं डरना है क्योंकि ओ-जोन का जो बोर्ड लगा है सिर्फ इसलिए लगा है की नई कालोनियां या नए मकान का निर्माण यहां ना हो.
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राजस्थान HC: खीचन विस्तार ग्राम गठन पर याचिका खारिज, प्रक्रिया कानूनसम्मत

Jodhpur, Rajasthan:जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जस्टिस संजीत पुरोहित की बेंच ने फलोदी जिले में नए राजस्व गांव खीचन विस्तार के गठन को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने माना कि राज्य सरकार ने गांव के गठन की प्रक्रिया तय नियमों के अनुसार पूरी की और प्रशासनिक जरूरतों को देखते हुए लिया गया निर्णय कानून सम्मत है। खीचन निवासी सत्यनारायण सिंह राजपूत ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर राजस्व विभाग की 13 दिसंबर 2025 की अधिसूचना को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि खीचन विस्तार गांव का गठन निर्धारित मापदंडों के अनुरूप नहीं है और पहले की प्रक्रिया में इसे रद्द किया जा चुका था। इसलिए दोबारा अधिसूचना जारी करना गलत है। राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि नए गांव के गठन से पहले अधिकारियों ने मौके का निरीक्षण कर रिपोर्ट तैयार की थी। रिपोर्ट में सामने आया कि खीचन और खीचन विस्तार के बीच दूरी निर्धारित मानकों के अनुसार है। अलग-अलग रास्तों से दोनों गांवों के केंद्र बिंदुओं की दूरी 1 किलोमीटर से अधिक पाई गई। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल कुछ खसरो के आपस में जुड़े होने के आधार पर गांव गठन को गलत नहीं माना जा सकता। नए गांव बनाने के लिए दूरी, प्रशासनिक सुविधा, विकास की संभावना और स्थानीय जरूरतों जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है। याचिकाकर्ता की ओर से राजनीतिक दबाव में अधिसूचना जारी होने का आरोप भी लगाया गया था। इस पर कोर्ट ने कहा कि किसी जनप्रतिनिधि द्वारा मांग या सुझाव दिए जाने मात्र से प्रशासनिक फैसला अवैध नहीं हो जाता। इसके लिए ठोस दुर्भावना या नियमों के उल्लंघन के प्रमाण जरूरी हैं। कोर्ट ने राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि गांवों के गठन और सीमाओं में बदलाव का अधिकार राज्य सरकार के पास है। पर्याप्त आधार नहीं मिलने पर हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और खीचन विस्तार गांव के गठन को बरकरार रखा।
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राजस्थान हाईकोर्ट ने नगरपालिका वित्तीय अधिकारों पर रोक बरकरार रखी

Jodhpur, Rajasthan:जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जस्टिस संजीत पुरोहित की बेंच ने नगर निकायों में वित्तीय अधिकारों के संचालन को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार के उस आदेश पर रोक बरकरार रखी है, जिसमें नगरपालिका के कई वित्तीय अधिकार अधिशाषी अधिकारी (ईओ) को अकेले देने की व्यवस्था की गई थी। कोर्ट ने कहा कि किसी भी प्रशासनिक सुविधा के नाम पर कानून में तय व्यवस्था और जवाबदेही के सिद्धांत को दरकिनार नहीं किया जा सकता। मामला पाली जिले की खुडाला-फालना नगरपालिका से जुड़ा है। पूर्व पार्षद भारत कुमार चौधरी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर राज्य सरकार के 7 फरवरी 2026 के आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश के जरिए नगरपालिका के वित्तीय अधिकारों को ईओ के स्तर पर केंद्रित करने की कोशिश की गई थी। इससे पहले 29 अप्रैल 2026 को हाईकोर्ट ने इस आदेश के अमल पर अंतरिम रोक लगा दी थी। राज्य सरकार ने अंतरिम रोक हटाने के लिए आवेदन पेश किया, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 226(3) के तहत रोक हटाने की प्रक्रिया तभी लागू होती है जब प्रभावित पक्ष को याचिका की जानकारी और सुनवाई का अवसर नहीं मिला हो। इस मामले में सरकार को पहले ही पर्याप्त अवसर दिया गया था, लेकिन उस समय कोई उपस्थित नहीं हुआ। हाईकोर्ट ने कहा कि सुनवाई का अवसर देना और उस अवसर का उपयोग करना अलग-अलग बातें हैं। यदि किसी पक्ष को मौका दिया गया और उसने इसका लाभ नहीं उठाया तो बाद में यह दावा नहीं किया जा सकता कि उसे सुनवाई से वंचित किया गया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता दिविक माथुर ने तर्क दिया गया कि नगरपालिका का कार्यकाल समाप्त होने के बाद प्रशासक नियुक्त किया गया था। ऐसे में वित्तीय फैसलों में प्रशासक और ईओ की संयुक्त भूमिका जरूरी है। ईओ को अकेले अधिकार देने से वित्तीय नियंत्रण और पारदर्शिता प्रभावित होगी। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि नियमों में वित्तीय मामलों के लिए संतुलन और निगरानी की व्यवस्था बनाई गई है। केवल कार्य सुविधा के आधार पर इस व्यवस्था को बदला नहीं जा सकता। कोर्ट ने कहा कि स्थानीय स्वशासन संस्थाओं की लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप अधिकारों का संतुलन बनाए रखना जरूरी है। हाईकोर्ट ने सरकार की दलील भी स्वीकार नहीं की कि आदेश केवल अस्थायी व्यवस्था के तौर पर जारी किया गया था। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई आदेश वैधानिक ढांचे से मेल नहीं खाता तो उसे अस्थायी कहकर लागू नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने अंतरिम रोक को याचिका के अंतिम निस्तारण तक जारी रखते हुए मामले को अगस्त 2026 के पहले सप्ताह में अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने के निर्देश दिए हैं।
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