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कौनजी पहाड़ी गांव में घर से इलाज: expired दवाएं जब्त, सख्त कार्रवाई की चेतावनी

Noida, Uttar Pradesh:Based on a complaint that a mother and son belonging to the same family were illegally providing medical treatment from their house in Kaunji hill village of Kodaikanal, officials conducted an inspection and seized a large number of expired medicines and tablets. The District Health and Rural Welfare Department carried out the sudden action. Kaunji is one of the hill villages located in the Kodaikanal region of Dindigul district, Tamilnadu. Since there is no hospital or primary health centre in this hill village, residents usually have to travel around 10 kilometres to Mannavanur to receive medical treatment. Officials of the District Health and Rural Welfare Department received a complaint that Prince, who works at a xerox shop in the village, along with his mother Baby, had been providing medical treatment to patients from their house. Based on this complaint, a team of doctors led by Joint Director Bharathi conducted a surprise inspection at Prince’s house in Kaunji village. During the inspection, expired medicines and government-supplied tablets were found and seized. Officials warned that strict action will be taken if they are found again treating patients or distributing medicines in the coming days. They also stated that the seized medicines will be sent to a laboratory for testing, and further action will be taken against both the mother and son based on the results, according to the District Health and Rural Welfare Department.
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राजस्थान हाईकोर्ट: खनन लीज निरस्तीकरण, 30 दिन का नोटिस अनिवार्य, लीज बहाली का आदेश

Jodhpur, Rajasthan:जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने खनन लीज निरस्तीकरण के एक अहम मामले में सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए बिना लीज रद्द करना पूरी तरह अवैध है। न्यायाधीश संजीत पुरोहित की एकलपीठ ने बिना 30 दिन का अनिवार्य नोटिस दिए लीज समाप्त करने की कार्रवाई को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता की लीज बहाल करने के आदेश दिए। याचिकाकर्ता तखत सिंह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास बालिया ने बताया कि याचिकाकर्ता को वर्ष 2020 में खनिज क्वार्ट्ज और फेल्डस्पार के खनन के लिए 50 वर्षों की लीज प्रदान की गई थी। बाद में खनन विभाग ने कथित उल्लंघनों का आरोप लगाते हुए पहले नोटिस जारी किया और फिर करीब 1.53 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाकर 19 अक्टूबर 2022 को लीज रद्द कर दी। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि उन्होंने सभी आरोपों का जवाब दिया था और सरकार की एमनेस्टी योजना के तहत पूरी बकाया राशि जमा कर नो ड्यूज सर्टिफिकेट भी प्राप्त कर लिया था। इसके बावजूद विभाग ने लीज बहाल नहीं की, जो अनुचित है। न्यायालय ने सुनवाई के दौरान पाया कि खनन नियम, 2017 के तहत लीज समाप्त करने से पहले 30 दिन का स्पष्ट और अलग नोटिस देना अनिवार्य है। केवल प्रारंभिक नोटिस में संभावित कार्रवाई का उल्लेख करना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। इस अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किए जाने से पूरी कार्रवाई अवैধ हो जाती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि लीज समाप्त करना अंतिम विकल्प होना चाहिए और पहले कम कठोर विकल्प जैसे जुर्माना लगाने पर विचार करना जरूरी है। बिना विचार किए सीधे लीज रद्द करना न्यायसंगत नहीं है। साथ ही कोर्ट ने यह भी माना कि विभाग द्वारा पारित जुर्माना आदेश तर्कसंगत नहीं था और उसमें याचिकाकर्ता के जवाब पर विचार नहीं किया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। हाईकोर्ट ने 18 अप्रैल 2022 और 19 अक्टूबर 2022 के आदेशों को निरस्त करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए कि याचिकाकर्ता की खनन लीज तुरंत बहाल की जाए。
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राजस्थान हाईकोर्ट ने अवमानना मामले में 12 सप्ताह समय दिया; अधिकारी व्यक्तिगत हाजिर होंगे

Jodhpur, Rajasthan:जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने अतिक्रमण हटाने से जुड़े अवमानना प्रकरण में राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाते हुए अंतिम मौका दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि अगली सुनवाई तक आदेशों की पूर्ण पालना नहीं हुई तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। जस्टिस रेखा बोराणा की एकलपीठ के समक्ष सूरज प्रकाश दवे के उत्तराधिकारियों की ओर से अधिवक्ता विनीत आर दवे ने अवमानना याचिका पेश की। याचिका में पूर्व में दिए गए न्यायालय के आदेशों की पालना नहीं होने का मुद्दा उठाया गया था। न्यायालय ने 18 मार्च 2026 को सुनवाई के दौरान स्थानीय स्वशासन विभाग और नगरीय विकास एवं आवासन विभाग के प्रमुख सचिवों को अनुपालना रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे। साथ ही यह भी कहा गया था कि यदि आदेशों की पालना नहीं होती है तो संबंधित अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना होगा। सुनवाई में राज्य सरकार की ओर से समय बढ़ाने का अनुरोध किया गया। सरकार ने अदालत को बताया कि इस मामले में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया है, जिसकी बैठक 10 अप्रैल 2026 को आयोजित की गई। समिति के निर्णय के अनुसार कुल 194 अतिक्रमणकारियों को सार्वजनिक नोटिस जारी किए गए हैं और प्रत्येक को व्यक्तिगत नोटिस भी दिया गया है। इन नोटिसों के माध्यम से अतिक्रमण हटाने के लिए 15 दिन का समय दिया गया है। सरकार ने यह भी दलील दी कि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई से पहले प्रभावित पक्षों को पर्याप्त अवसर देना जरूरी था, इसलिए यह प्रक्रिया अपनाई गई है। आश्वासन दिया गया कि निर्धारित समयावधि के बाद अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी और उसकी अनुपालना रिपोर्ट अदालत में पेश की जाएगी। अदालत ने सरकार की इस दलील को स्वीकार करते हुए 12 सप्ताह का अतिरिक्त समय प्रदान किया, लेकिन इसके साथ ही सख्त रुख भी अपनाया। न्यायालय ने साफ कहा कि यदि अगली तारीख तक आदेशों की वास्तविक और पूर्ण पालना नहीं होती है तो किसी भी प्रकार की ढील नहीं दी जाएगी। उस स्थिति में स्थानीय स्वशासन विभाग के प्रमुख सचिव, नगरीय विकास विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव, जोधपुर नगर निगम के आयुक्त और जोधपुर विकास प्राधिकरण के सचिव को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा। मामले की अगली सुनवाई 10 जुलाई 2026 को होगी, जहां अनुपालना रिपोर्ट पेश की जाएगी。
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राजस्थान हाईकोर्ट ने 20% जमा शर्त पर अंतरिम रोक लगाई

Jodhpur, Rajasthan:जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जस्टिस बलजिंदरसिंह संधू की एकलपीठ ने परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 143ए के तहत 20 प्रतिशत राशि जमा कराने की शर्त को लेकर महत्वपूर्ण अंतरिम राहत देते हुए उक्त शर्त के प्रभाव पर रोक लगा दी है। मामला उदयपुर निवासी विनोद द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है, जिसमें अधीनस्थ न्यायालय के 9 मार्च 2026 के आदेश को चुनौती दी गई थी। अधिवक्ता हर्षित भूरानी ने तर्क दिया कि धारा 143ए एवं 148 को परक्राम्य लिखत (संशोधन) अधिनियम, 2018 के जरिए जोड़ा गया था, लेकिन बाद में रिपीलिंग एंड अमेंडिंग एक्ट, 2025 द्वारा इस संशोधन अधिनियम को निरस्त कर दिया गया। यह निरसन 20 दिसंबर 2025 से प्रभावी होकर 1 जनवरी 2026 को अधिसूचित हुआ। ऐसे में इन धाराओं का कानूनी अस्तित्व समाप्त हो चुका है। हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया इन तर्कों को स्वीकार करते हुए माना कि जिस आधार पर 20 प्रतिशत राशि जमा करने की शर्त लगाई गई, वह प्रावधान अब प्रभावी नहीं हैं। चूंकि अधीनस्थ न्यायालय का आदेश निरसन के बाद पारित हुआ, इसलिए इस शर्त को लागू करना उचित नहीं माना गया। न्यायालय ने आदेश के उस हिस्से पर रोक लगा दी है, जिसमें 20 प्रतिशत राशि जमा करने की बाध्यता तय की गई थी। इस अंतरिम राहत से याचिकाकर्ता को बड़ी राहत मिली है, जबकि मामले की अंतिम सुनवाई अभी शेष है।
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