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विकसित भारत जी राम जी पर सपा सांसद रामजीलाल सुमन का जुबानी हमला , सरकार कर रही श्रमिकों के साथ धोखा
Agra, Uttar Pradesh
आगरा
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव एवं राज्यसभा सांसद रामजीलाल सुमन ने भारत सरकार द्वारा मनरेगा के स्थान पर विकसित भारत रोजगार और आजीविका के लिए गारंटी मिशन (ग्रामीण) अर्थात वीबी जी-राम-जी किए जाने की आलोचना करते हुए कहा है कि इनका सही मकसद तो इस योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाना है, ये गांधी के कातिल हैं लेकिन इन्हें अपनी गलत फहमी दूर कर लेनी चाहिए कि उनके मारने से गांधी तो मर सकते लेकिन उनके विचार नहीं, वे अजर अमर हैं। गांधी विचारों के प्रति दुनिया में और ज्यादा आकर्षण बढ़ रहा है, गांधीजी का नाम केवल एक नाम नहीं बल्कि स्वराज और ग्राम विकास का दर्शन है। दुनिया की सबसे बड़ी जनकल्याणकारी योजना से गांधीजी का नाम हटाना जघन्य अपराध है। गांधी विचार विश्व के लिए और ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं।
रामजीलाल सुमन ने कहा है कि नया कानून ग्राम पंचायतों की स्वायत्तता पर हमला है, श्रमिकों से काम कराने का निर्णय जो ग्राम पंचायत करती थी उसका निर्णय सरकार द्वारा नामित संस्था करेगी, मनरेगा के संचालन हेतु जो आर्थिक व्यवस्था थी उसके मुताबिक 90 प्रतिशत अंश भारत सरकार का और 10 प्रतिशत अंश राज्य सरकार का होता था लेकिन अब इस नई योजना के मुताबिक 60 प्रतिशत केंद्र सरकार और 40 प्रतिशत हिस्सेदारी राज्य सरकार की कर दी गई है। ये निर्णय अत्यधिक अव्यावहारिक है और उन्हें इस योजना की सफलता पर संदेह है। देश के तमाम राज्य बीमारू हैं, तथा राज्यों की आय के सीमित संसाधन होते हैं, कई राज्य केंद्र सरकार से विशेष आर्थिक पैकेज की मांग करते रहे हैं। उनके लिए इस 40 प्रतिशत की हिस्सेदारी का वहन करना असंभव है। जहां तक उत्तर प्रदेश का सवाल है इस समय प्रदेश पर 7.7 लाख करोड़ रुपए, तमिलनाडु पर 8.3 लाख करोड़ रुपए, महाराष्ट्र पर 7.2 लाख करोड़ रुपए का भारी कर्जा है। इससे सहज ही ये अनुमान लगाया जा सकता है कि पहले से ही आर्थिक बोझ से दबे राज्य इस योजना का आर्थिक वहन कैसे कर पाएंगे।
रामजीलाल सुमन ने आगे कहा कि नए कानून में ग्रामीण अंचल के श्रमिकों को 125 दिन काम दिए जाने का वादा किया है, यहां यह बताना आवश्यक है कि मनरेगा में 100 दिन श्रमिकों को काम दिए जाने की गारंटी थी। सरकार ने संसद के एक लिखित सवाल के जवाब में स्वयं स्वीकार किया है कि विगत वर्षों में श्रमिकों को औसतन सिर्फ 50 दिन का ही काम मिला है, तो ये कैसे विश्वास किया जा सकता है कि जो सरकार 100 दिन के काम की गारंटी पूरी नहीं कर सकी वह 125 दिन काम दे पाएगी। उन्होंने मजदूरी दरों को अत्यधिक अव्यावहारिक होने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि आज ग्रामीण अंचल में मजदूरी दर 500 रुपए प्रतिदिन तक है जबकि मनरेगा श्रमिकों को मध्य प्रदेश में 261 रुपए, बिहार में 255 रुपए, नागालैंड में 241 रुपए तथा उत्तर प्रदेश में यह 252 रुपए प्रतिदिन की मामूली मजदूरी मिलती है। सरकार बताए कि इतनी कम मजदूरी पर भला कौन श्रमिक काम करना चाहेगा। जबकि संसद द्वारा सप्तगिरि शंकर उलाका की अध्यक्षता में गठित ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग की स्थायी समिति ने विगत अप्रैल में सरकार को संस्तुति की थी कि मनरेगा श्रमिक को कम से कम 400 रुपए प्रतिदिन मजदूरी मिलनी चाहिए। समिति ने सरकार से ये भी कहा कि महंगाई दर को आधार मानकर मनरेगा श्रम का निर्धारण होना चाहिए लेकिन सरकार ने इस दिशा में कोई सार्थक निर्णय नहीं लिया।
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