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बूंदी के राजपुरोहित परिवार की 300 वर्ष पुरानी गणगौर परंपरा आज भी जीवित
PCPranay Chakraborty
Mar 21, 2026 18:16:04
Noida, Uttar Pradesh
बूंदी में 300 साल पुरानी गणगौर आज भी जीवित, राजपुरोहित परिवार निभा रहा परंपरा
बूंदी: जहां एक ओर बूंदी में ऐतिहासिक कारणों के चलते गणगौर का उत्सव सीमित दायरे में सिमट गया है, वहीं कुछ परिवार आज भी इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। राजपुरोहित परिवार से का घर इसका प्रमुख उदाहरण है, जहां करीब 300 साल पुरानी गणगौर आज भी स्थापित है और पूरे श्रद्धा भाव के साथ पूजा-अर्चना की जाती है।
परिवार की महिलाओं ने बताया कि उनके यहां पीढ़ियों से गणगौर की पूजा की परंपरा चली आ रही है, जिसे आज भी पूरी निष्ठा के साथ निभाया जा रहा है। हालांकि, समय के साथ इस उत्सव का स्वरूप बदल गया है और अब यह केवल दो दिनों तक ही सीमित रह गया है, लेकिन आस्था में कोई कमी नहीं आई है।
गणगौर के अवसर पर घर में विशेष पूजन किया जाता है, जिसमें आसपास की महिलाएं भी शामिल होती हैं। पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ गणगौर की पूजा की जाती है और धार्मिक गीतों के साथ माहौल भक्तिमय बना रहता है।
बूंदी में जहां एक ऐतिहासिक हादसे के कारण गणगौर का सार्वजनिक उत्सव फीका पड़ गया, वहीं ऐसे परिवार आज भी इस परंपरा को संजोए हुए हैं। यह न केवल उनकी आस्था का प्रतीक है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सांस्कृतिक विरासत भी है।
इस तरह, बूंदी में गणगौर का पर्व भले ही सीमित रूप में मनाया जा रहा हो, लेकिन कुछ घरों में इसकी परंपरा आज भी उतनी ही मजबूत और जीवित है, जो शहर की सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में अहम भूमिका निभा रही है।
हादसे के बाद 400 साल से फीका पड़ा बूंदी का यह पर्व
राजस्थान को त्योहारों की धरती कहा जाता है, जहां हर पर्व पूरे उल्लास और परंपरा के साथ मनाया जाता है। लेकिन बूंदी में एक ऐसा लोकपर्व है, जिसकी चमक एक दर्दनाक हादसे के बाद आज तक फीकी पड़ी हुई है। हम बात कर रहे हैं गणगौर की, जिसे बूंदी राजपरिवार आज भी पारंपरिक रूप में नहीं मनाता। करीब 300-400 साल पहले हुई एक घटना ने इस परंपरा को पूरी तरह बदल दिया। आज भी यह पर्व सीमित दायरे में ही सिमटा हुआ है।
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