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मरुस्थल के नक्शे के खेल से उभरी पश्चिमी राजस्थान की सत्ता की जंग
DSDurag singh Rajpurohit
Jan 05, 2026 14:45:10
Barmer, Rajasthan
आधी रात के फैसले से धरनों तक: मरुस्थल में सियासत की सबसे बड़ी लड़ाई
(ग्राउंड रिपोर्ट)
31 दिसंबर की आधी रात: जब नक्शा बदला, राजनीति उबल पड़ी
31 दिसंबर 2025 की रात…
जब पूरा प्रदेश नए साल की तैयारी में था, उसी वक्त राजस्थान सरकार की एक अधिसूचना ने पश्चिमी राजस्थान की सियासत को झकझोर दिया। बाड़मेर और बालोतरा जिलों की सीमाओं में ऐसा फेरबदल हुआ, जिसने सिर्फ प्रशासनिक नक्शा नहीं बदला, बल्कि लोगों की दिनचर्या, राजनीतिक समीकरण और आने वाले परिसीमन की दिशा भी बदल दी।
सरकारी आदेश के मुताबिक
धोरीमना और गुड़ामालनी उपखंड बाड़मेर जिले से हटाकर बालोतरा जिले में शामिल कर दिए गए, जबकि बायतु उपखंड को बालोतरा से अलग कर वापस बाड़मेर जिले में जोड़ दिया गया। पाटोदी-गिड़ा बालोतरा में ही रहे और नोखड़ा बाड़मेर में।
इस बदलाव के साथ ही मरुस्थल की राजनीति में नई लकीरें खिंच गईं।
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अंकगणित नहीं, असर बड़ा: 2.5 लाख मतदाता प्रभावित
इस सीमांकन का सीधा असर लगभग ढाई लाख मतदाताओं पर पड़ा है।
बाड़मेर जिला परिषद के वार्ड 39 से घटकर 37 रह गए, वहीं बालोतरा जिला प्रशासनिक रूप से और बड़ा हो गया।
अब बालोतरा जिले में
5 उपखंड: बालोतरा, सिणधरी, सिवाना, धोरीमना, गुड़ामालनी
9 तहसील
कागजों में यह फैसला संतुलन का प्रतीक बताया गया, लेकिन ज़मीन पर तस्वीर कहीं ज्यादा जटिल नजर आई।
धोरीमना उपखंड इस पूरे विवाद का केंद्र बन गया।
यह इलाका पहले बाड़मेर जिला मुख्यालय से करीब 66 किलोमीटर दूर था।
अब बालोतरा जिला मुख्यालय की दूरी करीब 145 किलोमीटर हो गई है।
राजस्व कार्यालय, अदालत, पुलिस प्रशासन और सरकारी योजनाओं से जुड़ा हर काम अब ज्यादा समय और खर्च मांगता है।
स्थानीय जानकारों का कहना है कि सीमावर्ती इलाकों में प्रशासनिक फैसले केवल नक्शे देखकर नहीं, बल्कि भूगोल, पहुंच और आपातकालीन जरूरतों को ध्यान में रखकर लिए जाने चाहिए।
इसी वजह से यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या इस फैसले में सुरक्षा पहलू पर पर्याप्त विचार हुआ।
चार जनवरी की सुबह धोरीमना के मुख्य चौक पर माहौल पूरी तरह बदल चुका था।
ठंड तेज थी, लेकिन राजनीति उससे भी ज्यादा गर्म।
पूर्व राजस्व मंत्री हेमाराम चौधरी अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ चुके थे।
रातभर खुले आसमान के नीचे, समर्थकों के बीच बैठकर उन्होंने सरकार के फैसले को चुनौती दी।
उनका कहना था कि यह फैसला भौगोलिक, ऐतिहासिक और जनसुविधा तीनों के खिलाफ है।
बाइट: हेमाराम चौधरी, पूर्व राजस्व मंत्री
“धोरीमना हमेशा से बाड़मेर से जुड़ा रहा है।
बाड़मेर 66 किलोमीटर था, बालोतरा 145 किलोमीटर।
ये फैसला जनता के साथ धोखा है।
सरकार को झुकना पड़ेगा, क्योंकि ये लड़ाई जनता की है।”
धोरीमना की खास बात यह रही कि यहां विरोध और समर्थन दोनों एक साथ नजर आए।
जहां एक ओर धरना चल रहा था, वहीं कस्बे के दूसरे हिस्से में कुछ लोग डीजे और ढोल-नगाड़ों के साथ फैसले का स्वागत कर रहे थे।
उनका तर्क था कि बालोतरा औद्योगिक जिला है और वहां जुड़ने से विकास के नए अवसर मिलेंगे। रिफाइनरी बालोतरा में ही शुरू होने वाली हैं।
यह दृश्य बताता है कि सीमांकन ने केवल प्रशासन नहीं बदला, बल्कि समाज के भीतर भी मतभेद उजागर कर दिए।
गुड़ामालनी में माहौल अपेक्षाकृत शांत रहा, लेकिन सवाल यहां भी वही थे।
स्थानीय लोगों का कहना था कि सरकारी दफ्तर अब और दूर हो गए हैं।
हालांकि कुछ व्यापारियों ने इसे नए जिले से जुड़ने का अवसर भी बताया।
यह चुप्पी दरअसल असमंजस की थी
लाभ होगा या नुकसान, यह वक्त बताएगा।
दूसरी ओर, बायतु उपखंड के बाड़मेर में वापस आने से राजनीतिक माहौल अलग रंग में दिखा।
बायतु विधायक हरीश चौधरी ने इसे बेहद ग़लत बताया
उनका बयान X पर काफी चर्चा में रहा। तुम इधर भेजो मुझे तुम उधर भेजो मुझे , नक्शों से खेलकर चाहे जिधर भेजो मुझे, सीमाएं बदलने से ना डरूंगा न झुकूंगा, मैं अपने लोगों के साथ खड़ा हूं चाहे किधर भेजो मुझे
बाइट: हरीश चौधरी, विधायक बायतु
सीमांकन के बाद जयपुर से लेकर दिल्ली तक सियासी बयानबाज़ी तेज हो गई।
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इसे
“31 दिसंबर की आधी रात का तुगलकी फरमान” बताया।
उनका आरोप था कि यह फैसला 2026 परिसीमन से पहले राजनीतिक समीकरण साधने के लिए लिया गया।
भाजपा नेता स्वरूप सिंह खारा ने हरीश चौधरी पर तीखा हमला बोला।
उन्होंने कहा कि यह निर्णय जनता की सहमति से हुआ हैं और बायतु बाड़मेर का सांस्कृतिक हिस्सा हैं खारा का कहना था कि जातिवाद की बात हरीश चौधरी न करें सभी उनके बारे में जानते हैं।
बाइट: स्वरूप सिंह खारा
भाजपा नेताओं ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया।
उनका कहना है कि बालोतरा को मजबूत करना जरूरी है, ताकि उद्योग, रोजगार और प्रशासनिक संतुलन बेहतर हो सके।
भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस खुद अंदरूनी असंतोष से जूझ रही है और धरनों के जरिए माहौल बना रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरा विवाद 2026 में प्रस्तावित परिसीमन से जुड़ा हुआ है।
जिलों और उपखंडों की संरचना बदलने से भविष्य की विधानसभा और लोकसभा सीटों पर असर पड़ सकता है। इसी कारण यह फैसला केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि रणनीतिक माना जा रहा है。
किसान हों या व्यापारी, महिलाएं हों या बुजुर्ग—
हर कोई शायद यही पूछ रहा है कि क्या उनकी सुविधा प्राथमिकता थी या राजनीति。
धोरीमना, गुड़ामालनी और बायतु का यह विवाद बताता है कि प्रशासनिक सीमाएं केवल रेखाएं नहीं होतीं, इनके पीछे लोगों की ज़िंदगी जुड़ी होती है。
धरने, बाइट्स और आरोप-प्रत्यारोप के बीच अब नजरें सरकार पर टिकी हैं
क्या फैसले की समीक्षा होगी,
या यह मुद्दा पश्चिमी राजस्थान की राजनीति में लंबे समय तक सुलगता रहेगा।
मरुस्थल की रेत पर खिंची ये लकीरें
आने वाले चुनावों में कितनी गहरी होंगी,
यह वक्त तय करेगा। लेकिन यह तय हैं कईयों की राजनीतिक जमीन इस फैसले से हिल गई हैं。
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