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20 साल से नशामुक्त होली: मल्याल गांव की अनुशासनपूर्ण परंपरा
DBDEVENDRA BISHT
Mar 02, 2026 11:55:57
Almora, Uttarakhand
उत्तराखंड के इस गांव में 20 साल से नशामुक्त होली
शराब-बीड़ी पर पूर्ण प्रतिबंध, उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई
चीर बंधन से शुरू होती परंपरा, अनुशासन और संस्कृति बना पहचान
उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट विकासखंड का मल्यााल गांव पिछले करीब दो दशकों से नशामुक्त होली मना रहा है। यहां होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि संस्कृति, अनुशासन और सामाजिक एकता का पर्व बन चुकी है। बड़े-बुजुर्गों ने वर्षों पहले जो मर्यादा तय की थी, युवा पीढ़ी आज भी उसी दायरे में बंधी है。
दो दशक पहले लिया गया ऐतिहासिक फैसला
करीब 20 से 25 वर्ष पूर्व होली के दौरान शराब के कारण गांव में अराजकता, लड़ाई-झगड़े और गाली-गलौज की घटनाएं बढ़ने लगी थीं। सदियों से चली आ रही परंपरा प्रभावित होने लगी। तब ग्राम सभा ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि होली में शराब और किसी भी प्रकार का नशा पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। फैसला हुआ कि नशे में पाए जाने वाले व्यक्ति को परिजनों को बुलाकर घर भेजा जाएगा। यदि फिर भी बात न बने तो उसे गांव के गोठ में बंद किया जाएगा। फैसले के बाद हुड़दंग करने वालों को समर्थन नहीं मिला और धीरे-धीरे मल्यााल गांव की होली पूरी तरह नशामुक्त हो गई।
एकादशी से चीर बंधन के साथ होती है शुरुआत
मल्यााल गांव में होली की विधिवत शुरुआत एकादशी से होती है। इस दिन रंग पड़ने के साथ गांव के पधान के घर चीर बंधन किया जाता है। पधान उस कुल का सबसे बड़ा बेटा होता है, जो प्राचीन काल में चंद राजाओं के लिए राजस्व वसूलने का कार्य करता था। सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार हर घर से अबीर, गुलाल, रोली, अक्षत, फूल, बतासे, दक्षिणा और दो लाल व दो पीले रंग के दो-दो मीटर लंबे, चार इंच चौड़े कपड़े लाए जाते हैं। पधान के आंगन में सामूहिक रूप से चीर बांधी जाती है। गणेश पूजा के साथ होलिका को देवी का प्रतीक मानकर जागृत किया जाता है।
मंदिरों में गूंजती है पारंपरिक होली
एकादशी की शाम ग्रामीण कालिका और भूमिया देवी मंदिर पहुंचते हैं। यहां पहले महिलाओं की होली गाई जाती है, उसके बाद पुरुष होली गायन करते हैं। हर परिवार से दक्षिणा और गुड़ चढ़ाया जाता है, जिससे बाद में हलवा बनाया जाता है। धुंधेश्वरी देवी का आह्वान किया जाता है। मान्यता है कि इससे गांव के दुख दूर होते हैं और देवी रक्षा करती हैं।
घर-घर पहुंचती है होली, बाखली में तय क्रम
चीर बंधन के बाद होली गांव के हर घर तक पहुंचती है। बाखली के एक तिहाई घरों में पहले दिन, एक तिहाई में दूसरे दिन और शेष घरों में तीसरे दिन होल्यार पहुंचते हैं। होल्यार पारंपरिक रागों में होली गीत गाते हैं, आशीर्वाद देते हैं और हर घर से गुड़ की भेली अनिवार्य रूप से ली जाती है। संपन्न परिवार होल्यारों को गुजिया, आलू और अन्य पकवान खिलाते हैं।
चतुर्दशी और पूर्णिमा की विशेष परंपराएं
चतुर्दशी के दिन शिव मंदिर में विशेष होली गायन होता है। पूर्णिमा को होलिका दहन के साथ चीर को ले जाया जाता है और परंपरा अनुसार सुरक्षित रख दिया जाता है। छलड़ी के दिन होली को पूरे गांव में घुमाया जाता है। इस दौरान बुजुर्ग सामाजिक समरसता का संदेश देते हुए आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
चीर सबसे आगे, पीछे चलते हैं होल्यार
ग्राम सभा के निर्णय के अनुसार जुलूस में सबसे आगे चीर चलती है और उसके पीछे होल्यार। इस दौरान अनुशासन का कड़ाई से पालन किया जाता है। किसी भी प्रकार का हुड़दंग या नशा बर्दाश्त नहीं किया जाता।
कभी होती थी चीर लूट, अब परंपरा सुरक्षित
ग्रामीण बताते हैं कि कालीगाड़ पट्टी के करीब दो दर्जन गांवों में पहले केवल चार-पांच स्थानों पर ही चीर बंधन होता था। जिन गांवों में चीर नहीं होती थी, वहां के लोग अन्य गांवों की चीर छीनने का प्रयास करते थे। इससे मारपीट और यहां तक कि हथियारों के इस्तेमाल की घटनाएं भी होती थीं। कानून व्यवस्था प्रभावित होने के बाद इस परंपरा को बंद कर दिया गया।
पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा बना गांव
ग्रामीण प्रमोद जोशी और राम जोशी बताते हैं कि मल्यााल गांव की नशामुक्त होली अब पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा बन रही है। आज जब कई स्थानों पर होली में नशे का चलन बढ़ रहा है, ऐसे में मल्यााल गांव संयम, संस्कृति और सामाजिक एकता का संदेश दे रहा है। यहां होली सच मायनों में रंग, राग और मर्यादा का पर्व बन चुकी है
बाइट - प्रमोद जोशी, सदस्य होली समिति
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