चंपावत में सादगी से मनाया गया 25वां राज्य स्थापना दिवस
Tanakpur, Uttarakhand:चंपावत जिले में 25वां राज्य स्थापना दिवस सादगी से मनाया गया। इस अवसर पर जिला मुख्यालय समेत विभिन्न स्थानों पर शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई और विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए। गौरलचौड मैदान में आयोजित मुख्य कार्यक्रम में जिला पंचायत अध्यक्ष ज्योति राय की अध्यक्षता में राज्य आंदोलनकारियों ने अपने अनुभव साझा किए और उत्तराखंड राज्य को अग्रणी बनाने के लिए सहयोग देने की बात कही। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन भी सुनाया गया।
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बेतवा नदी का उद्गम कहां है? जानिए बुंदेलखंड की इस जीवनरेखा की अनसुनी कहानी
Pali Pahari, Jhansi, Uttar Pradesh:प्रवीण भार्गव/झांसी: बुंदेलखंड की जीवनरेखा कही जाने वाली बेतवा नदी का महत्व केवल जल, सिंचाई और जनजीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध प्राचीन धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं से भी जुड़ा हुआ है। इस नदी का प्राचीन नाम वेत्रवती है। विशेष बात यह है कि पद्म पुराण में बेतवा नदी के प्राकट्य को लेकर एक अद्भुत कथा का वर्णन मिलता है, जिसके अनुसार वृत्रासुर द्वारा खुदवाए गए महागंभीर नामक गहरे कुएं से दिव्य वेत्रवती नदी प्रकट हुई थी। पद्म पुराण में मिलता है नदी के प्राकट्य का वर्णन पद्म पुराण के उत्तरखंड में वेत्रवती नदी के माहात्म्य का वर्णन करते हुए भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं कि वेत्रवती नदी का महत्व अत्यंत विशेष है। पुराण में उल्लेख मिलता है कि प्राचीन काल में वृत्रासुर ने एक अत्यंत गहरा कुआं खुदवाया था, जिसका नाम महागंभीर था। उसी कुएं से दिव्य वेत्रवती नदी का प्राकट्य हुआ। पुराण में इस नदी को बड़े-बड़े पापों का नाश करने वाली और गंगा के समान पवित्र बताया गया है। इसमें स्नान करने और दर्शन करने से पुण्य प्राप्त होने की धार्मिक मान्यता का भी वर्णन किया गया है। इस कथा के कारण बेतवा नदी का धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है। वृत्रासुर से जुड़ी है महागंभीर कुएं की कथा पौराणिक मान्यताओं में वृत्रासुर का नाम एक शक्तिशाली असुर के रूप में आता है। बेतवा नदी से जुड़ी कथा में उसके द्वारा महागंभीर नामक कुएं का निर्माण कराए जाने का उल्लेख है। इसी कुएं से वेत्रवती के प्रकट होने की मान्यता है। यह कथा नदी को केवल प्राकृतिक जलधारा नहीं, बल्कि दिव्य स्वरूप प्रदान करती है। पद्म पुराण के उत्तरखंड के अध्याय 137 में भी वेत्रवती को वृत्र द्वारा निर्मित जलस्रोत से निकली नदी बताया गया है। इस प्रकार पुराण के अलग-अलग प्रसंगों में इस नदी की उत्पत्ति और महिमा का वर्णन मिलता है। प्राचीन नाम वेत्रवती, साहित्य में भी विशेष पहचान बेतवा नदी को प्राचीन काल में वेत्रवती के नाम से जाना जाता था। इसका उल्लेख प्राचीन भारतीय साहित्य और धार्मिक परंपराओं में मिलता है। महाकवि कालिदास के प्रसिद्ध काव्य मेघदूत में भी वेत्रवती नदी और विदिशा का उल्लेख मिलता है। इससे पता चलता है कि प्राचीन समय में यह नदी भौगोलिक दृष्टि के साथ-साथ साहित्य और संस्कृति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा थी। मध्य प्रदेश से उत्तर प्रदेश तक बहती है बेतवा भौगोलिक दृष्टि से बेतवा नदी का उद्गम मध्य प्रदेश में भोपाल के निकट झिरी गांव के आसपास माना जाता है। यह विंध्य पर्वतीय क्षेत्र से निकलकर मध्य प्रदेश के विदिशा सहित अनेक क्षेत्रों से गुजरती हुई उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में प्रवेश करती है। ओरछा और झांसी क्षेत्र के लिए भी यह नदी अत्यंत महत्वपूर्ण है। लगभग 590 किलोमीटर की यात्रा पूरी करने के बाद यह उत्तर प्रदेश के हमीरपुर के निकट यमुना नदी में मिल जाती है। ओरछा की ऐतिहासिक विरासत की साक्षी बेतवा नदी का मध्य प्रदेश के निवाड़ी जिले की ऐतिहासिक नगरी ओरछा से विशेष संबंध है। नदी के किनारे स्थित प्राचीन मंदिर, बुंदेला राजाओं की छतरियां और ऐतिहासिक महल आज भी इस क्षेत्र की गौरवशाली विरासत को दर्शाते हैं।
