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राजस्थान के 900 राजकीय मंदिरों में भारी संसाधन कमी; देवस्थान विभाग संकटग्रस्त
DGDeepak Goyal
Jan 21, 2026 09:15:57
Jaipur, Rajasthan
राजस्थान के करीब 900 राजकीय मंदिरों की व्यवस्था आज गंभीर संकट से गुजर रही है। देवस्थान विभाग, जो इन मंदिरों के संचालन और निगरानी की जिम्मेदारी संभालता है, खुद संसाधनों की भारी कमी से जूझ रहा है। हालात ऐसे हैं कि विभाग के आधे से ज्यादा पद खाली पड़े हैं और एक-एक अधिकारी के जिम्मे सात से आठ जिलों का काम है। नतीजा पूजा व्यवस्था से लेकर दान राशि के ऑडिट और विकास योजनाओं तक, सब कुछ प्रभावित हो रहा है।
जिस विभाग पर प्रदेश के करीब 900 राजकीय मंदिरों, हजारों सार्वजनिक प्रन्यासों और लाखों श्रद्धालुओं की आस्था को संभालने की जिम्मेदारी है, वही देवस्थान विभाग आज खुद सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है। विडंबना यह है कि भगवान के घरों की सेवा-व्यवस्था संभालने वाला विभाग अपने ही अस्तित्व और संसाधनों की लड़ाई लड़ रहा है। मंदिरों की पूजा, दान, सुरक्षा, सफाई और विकास योजनाओं की निगरानी करने वाला सिस्टम आधे से ज्यादा खाली कुर्सियों पर टिके हैं। विभाग के 469 स्वीकृत पदों में से 251 पद आज भी रिक्त हैं। यानी भगवान की सेवा का जिम्मा लगभग आधे से कम स्टाफ पर चल रहा है। प्रदेश के कई जिलों में हालात ऐसे हैं कि एक ही अधिकारी सात से आठ जिलों के मंदिरों की जिम्मेदारी संभाल रहा है। कई किलोमीटर के दायरे में फैले मंदिरों का निरीक्षण, शिकायतों का निस्तारण और प्रशासनिक फैसले कुछ गिने-चुने अधिकारियों के भरोसे हैं। नतीजा यह है कि कहीं शिकायतیں महीनों तक पड़ी रहती हैं, तो कहीं मंदिरों का निरीक्षण सालों से नहीं हुआ। दान-पेटियों की राशि, जमीनों के रिकॉर्ड, संपत्तियों का सत्यापन और लेखा परीक्षण जैसे काम समय पर नहीं हो पा रहे हैं। कई जगह वर्षों से मंदिरों का ऑडिट नहीं हुआ है। देवस्थान विभाग की हाल में हुई बैठक में मंत्री जोराराम कुमावत ने पुजारियों और अन्य पदों पर भर्ती को प्रस्ताव तैयार करवाने के निर्देश दिए हैं...बाइट-जोराराम कुमावत, देवस्थान विभाग
नए जिले बन गए, लेकिन देवस्थान विभाग के कार्यालय आज भी संभाग स्तर पर ही हैं। जिला स्तर पर कोई भी देवस्थान विभाग का दफ्तर नहीं हैं...पिछले 16 साल से देवस्थान विभाग का कैडर रिव्यू नहीं हुआ। अंतिम बार 2009 में विभाग की संरचना बदली गई थी। उसके बाद से विभाग की जिम्मेदारियां कई गुना बढ़ गईं, लेकिन ढांचा वही पुराना रह गया। 2008 में जहां सार्वजनिक प्रन्यासों की संख्या करीब 6100 थी, आज यह आंकड़ा 13 हजार के करीब पहुंच चुका है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब सोसायटी एक्ट से जुड़े संस्थानों का बोझ भी इसी विभाग पर आ गया है। यानी भगवान के नाम से चलने वाली संस्थाएं दोगुनी हो गईं, लेकिन उन्हें संभालने वाले हाथ आधे रह गए। वरिष्ठ नागरिक तीर्थ यात्रा योजना भी इसी विडंबना की मिसाल है। पहले हर साल करीब 10 हजार लोग जाते थे, अब यह संख्या 56 हजार तक पहुंच गई है। लेकिन इतने बड़े धार्मिक कार्यक्रम के लिए आज तक विभाग में एक भी नया पद नहीं बना। राज्य सरकार की बजट घोषणाओं से देवस्थान विभाग पर जिम्मेदारी और बढ़ गई है। 100 से ज्यादा मंदिरों के जीर्णोद्धार और नवनिर्माण का काम पर्यटन विभाग से हटाकर देवस्थान विभाग को सौंप दिया गया। धार्मिक उत्सवों और आयोजनों का बजट भी इसी विभाग के पास है। लेकिन इंजीनियर, तकनीकी स्टाफ और निगरानी तंत्र के बिना कई योजनाएं फाइलों में ही भगवान भरोसे पड़ी हैं। ग्रामीण इलाकों में स्थिति और भी संवेदनशील है। वहां के अराजकीय श्रेणी के मंदिरों का नियंत्रण, विवाद, कब्जे और कोर्ट केस सब कुछ देवस्थान अधिकारियों को देखना पड़ता है। तय मानक से कई गुना ज्यादा केस लंबित चल रहे हैं। नतीजा यह है कि अधिकारी दिन का आधा समय अदालतों में और आधा फाइलों में निकाल देते हैं...
कुल मिलाकर स्थिति यह है कि राजस्थान में भगवान के घर तो रोज़ खुले हैं, आरती होती है, शंख बजते हैं, लेकिन उन घरों की देखरेख करने वाला विभाग खुद संसाधनों के अभाव में भगवान भरोसे चल रहा है। आस्था कायम है, पर व्यवस्था थक चुकी है। और सवाल यही है कि जब भगवान का विभाग ही लाचार हो जाए, तो आस्था की जिम्मेदारी आखिर कौन निभाएगा...
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