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600 परिवारों के साथ जमीन के कागज़ी खेल का सच: रामनगर के ग्रामीणों की हक़ की जद्दोजहद
SKSATISH KUMAR
Jan 05, 2026 05:37:50
Jaspur, Uttarakhand
स्लग: अपनी ही मिट्टी पर पराए हुए ग्रामीण, तीन पीढ़ियां गुजर गईं हक की आस में।
स्थान: रामनगर, उत्तराखंड
एंकर: रामनगर के मालधनचौड़ से आज एक ऐसी दास्ताँ सामने आई है, जो हमारे लोकतंत्र और प्रशासन पर बड़े सवाल खड़ी करती है। यह कहानी उन 600 परिवारों की है जो पिछले 65 सालों से अपने ही आंगन में अवैध कहलाए जा रहे हैं। जिस मिट्टी को उन्होंने पसीने से सींचा, जिस जमीन पर उनकी तीन पीढ़ियां जवान होकर बुज्र्ग हो गईं, आज उसी जमीन पर उनका कोई कानूनी वजूद नहीं है। कागजों की हेराफेरी ने हजारों लोगों को उनके हक से महरूम कर दिया है।
VO: रामनगर का मोहननगर और शिवनाथपुर पुरानी बस्ती... कहने को तो ये विकसित गांव हैं, जहाँ स्कूल हैं, सड़कें हैं और राज्य और केंद्र सरकार के दिए बिजली-पानी के कनेक्शन भी हैं। लेकिन एक कड़वा सच इन ग्रामीणों के सीने में पत्थर की तरह चुभ रहा है। साल 1975 के लगभग से ये लोग लोकतंत्र के महापर्व में वोट डाल रहे हैं, लेकिन आज भी सरकारी फाइलों में इनके घरों का कोई वजूद नहीं है। विडंबना देखिए, इनके पास राशन कार्ड तो है पर अपनी जमीन की खतौनी नहीं। इनके पास वोटर आईडी तो है पर अपने आशियाने का मालिकाना हक नहीं। सरकार की हर योजना इनके दरवाजे तक पहुँचती है, बस एक अधिकार की चिट्ठी आज तक नहीं पहुँची।
बाइट: बसंत सिंह (ग्रामीण)
बाइट: कमल किशोर (जिला पंचायत सदस्य प्रतिनिधि)
VO 2: आज जब ये ग्रामीण विधायक कार्यालय पहुँचे, तो आँखों में नमी और हाथों में वो पुराने कागज़ थे जो अब धुंधले पड़ चुके हैं। ग्रामीणों ने सिसकते हुए बताया कि उनके दादा-परदादा इसी उम्मीद में दुनिया छोड़ गए कि एक दिन उनके बच्चों को अपनी जमीन पर हक मिलेगा। लेकिन अफसोस, आज उनकी तीसरी पीढ़ी भी वही जद्दोजहद कर रही है। आरोप है कि प्रशासन ने बड़ी चालाकी से इन आबाद बस्तियों को कृषि योग्य बंजर घोषित कर दिया। कागजों पर कलम चलाकर एक पूरी आबादी का वजूद ही मिटा दिया गया। फाइलों में दर्ज ये झूठ आज हजारों जिंदगियों पर भारी पड़ रहा है।
बाइट: राहुल कांडपाल (पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य गांधीनगर)
बाइट: दीवान सिंह बिष्ट (विधायक रामनगर)
फाइनल VO: सवाल बड़ा है... अगर यहां कोई रहता ही नहीं, तो ये रोड, ये नदी पर पुल, ये स्कूल और ये स्ट्रीट लाइट किसके लिए हैं? उन बुजुर्गों की रूह को क्या जवाब देगा प्रशासन, जो अपनी जमीन सरकारी दस्तावेज़ों में मालिकाना हक देखने की हसरत लिए इस दुनिया से चले गए? सिचाई के लिए सरकारी ट्यूवेल (बोर), खेतों में लहलहाती ये फसलें गवाही हैं कि यहाँ सिर्फ बंजर जमीन नहीं, बल्कि इंसानों के सपने दफन हैं। इन नम आंखों को अब बस मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से उम्मीद है। क्या इन 600 परिवारों का वनवास खत्म होगा? या फिर एक और पीढ़ी इस कागजी खेल की भेंट चढ़ जाएगी?
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