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ब्रजभूषण सिंह ने UGC बिल के विरोध में केंद्र-सरकार पर सवाल उठाए
AKAtul Kumar Yadav
Jan 28, 2026 14:18:43
Gonda, Uttar Pradesh
गोंडा के कैसरगंज से पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने यूजीसी बिल को लेकर की पहली बार अध्ययन करके अपना सार्वजनिक बयान जारी किया है और उन्होंने इस बिल का विरोध किया है। पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने कहा कि पिछले दिनों से यूजीसी पर एक विवाद हो रहा है और यूजीसी का विवाद यहाँ से शुरू होता है। कि सरकार पढ़ने वाले बच्चों के बीच में जो सवर्ण बच्चों के द्वारा कभी कोई घटना घट जाती है। उसको लेकर के दलित और ओबीसी बच्चों के संरक्षण के लिए एक कानून लेकर के आई है जिसके कारण बड़ी भ्रामक स्थिति हो गई है और आज देश में बड़े पैमाने पर विरोध हो रहा है।
ये मेरे सामने कुछ बच्चे हैं इनमें हमारे भी बच्चे हैं और दलित समाज और पिछड़े समाज, लगभग हर समाज के बच्चे हैं। ये रोज साथ में खेलते हैं। कितने दिन से तुम लोग साथ में खेल रहे हैं? (बच्चे एक साथ बोलते हैं: 'पाँच साल से') पाँच साल से ये बच्चे डेली शाम को आते हैं और खेलते हैं। फिर इनको कोई नाश्ता-पानी?" (बच्चे: 'हाँ, जैसे लड्डू, मिठाई, चाय, आम, मटर... जो घर पर रहता है')/"यानी जो घर पर रहता है, वो ये लोग साथ में बैठ कर के नाश्ता करते हैं।
ये कोई कानून के तहत नहीं कर रहे हैं ये कानून के बंदिश से नहीं खेल रहे हैं ये हमारी सनातन की परंपरा रही है। हमारे नस-नस में है। पंडित दीनदयाल जी ने कहा था कि जो नीचे हैं उनको ऊपर लाना है। और यही हमारी सनातन परंपरा है यही हमारी सवर्ण परंपरा है कि जो नीचे हैं उनके साथ भेदभाव न करना, ऊपर लेकर के आना। इसका मिसाल ये किसी कानून के तहत नहीं हो रहा है। आज मैं सरकार से कहना चाह रहा हूँ कि समाज कैसे चलता है ये ऑफिस में बैठ कर के समाज को नहीं चलाया जा सकता है।
समाज को चलाना है तो गाँव आइए और गाँव में देखिए कि बिना भेदभाव के बिना किसी जातीय रंग के, एक साथ बच्चे खेलते हैं। कोई बच्चा किसी की जात नहीं पूछता है। क्या आप चाहते हैं कि भविष्य में इस घर के अंदर एंट्री दी जाए तो ओबीसी को न दी जाए? क्या आप चाहते हैं इस घर में एंट्री दी जाए तो दलित को न दी जाए? ऐसा आप माहौल खड़ा कर रहे हैं।
"तो आपसे हाथ जोड़ कर के विनती है, इस मामले को वापस लीजिए और मैं अपील करना चाहता हूँ, सवर्ण समाज से अपील करना चाहता हूं उससे संपर्क करने की ज़रूरत है। जो दलित समाज के समझदार बच्चे हैं उनसे संपर्क करने की ज़रूरत है और उनसे इसका विरोध कराना है। क्योंकि गाँव में हम एक साथ रहते हैं। गाँव में कोई शादी होती है, ब्याह होता है, हर आदमी का कोई न कोई हक़ है, कोई न कोई नेग है, हर तरीके से भागीदारी होती है。
अभी मैंने सनातन कथा कराया 1 जनवरी से लेकर 8 जनवरी तक जिसमें सद्गुरु रितेश्वर महाराज जी ने कथा कहा मैंने 52 जाति समाज के जो धर्मगुरु थे, उनसे उद्घाटन कराया। उनसे एक-एक वृक्ष लिया और मैं सनातन वाटिका बनाने जा रहा हूँ आपने तो कानून बना कर के हमारे उस मिशन को स्वाहा कर दिया। आइए हम आपको दिखाते हैं कि कौन सा समाज ऐसा है जिसने उस कथा में भागीदारी नहीं की है, सहयोग नहीं किया है। "तो ये कोई नई परंपरा नहीं है, ये हमारी सनातन परंपरा है। इसमें कानून की कोई ज़रूरत नहीं है।
हाँ कोई बच्चा गलती करता है जो क्षमा करने योग्य नहीं है तो उसको आप सज़ा दीजिए यदा-कदा घटनाएँ घट जाती है सज़ा दीजिए, उसमें कोई विरोध नहीं है। लेकिन ये जो कानून है ये समाज में टकराव पैदा करेगा और इसीलिए कई दिन से मेरे ऊपर दबाव पड़ रहा था। 'बोलो, बोलो, बोलो' मैंने कहा हम गाँव में जाकर के बोलेंगे ये बच्चों को मैंने जान-बूझकर इकट्ठा नहीं किया है। इसमें हर जात-समाज के बच्चे हैं और एक रोज की बात नहीं, ये रोज खेलते हैं। ऐसा केवल यहां पर नहीं है हर गांव में है कोई क्रिकेट खेल रहा है कोई कबड्डी खेल रहा है यह सभी लोग एक साथ पढ़ते भी हैं।
इसके पहले भी अपने कानून बनाया दलितों के लिए अत्याचार ना हो इसको लेकर के अपने कानून बनाया क्या दलितों के ऊपर अत्याचार रुक गया। महिलाओं के साथ अत्याचार ना हो उसको लेकर के कानून बनाया गया क्या वह अत्याचार रुक गया दहेज के नाम पर अपने कानून बनाया क्या वह रुक गया। रुका नहीं दुरुपयोग किया जाता है जहां ऐसे कानून के समीक्षा होने की बात होनी चाहिए पता नहीं कि मंशा से अधिकारी ऑफिस में बैठकर के निर्णय ले लेते है। अब वह चाहते हैं कि यह बच्चे दोस्ती करें जाति देख कर करें वर्ग देखकर करें तो मैं इस कानून के पूर्णतया विरोध में हूँ अगर जरूरत पड़ेगी तो आंदोलन होगा लेकिन उस आंदोलन में केवल क्षत्रिय नहीं होंगे सनातन धर्म को मनाने वाले सब होंगे।
दलित भी होंगे पिछड़े भी होंगे ऐसे कानून की जरूरत नहीं है जो कानून हमको बंटता है तो कृपया हाथ जोड़कर विनती है मैं बहुत छोटा आदमी हूँ। पता नहीं इसका असर आप पड़े या ना पड़े ये गांव ऐसे नहींचलता है अगर इस लोकतंत्र को जिंदा रखना है तो गांव में क्या हो रहा है ऑफिस में बैठ करके आप गांव को नहीं देख सकते तो कृपया यह बन्द करिये। सवर्ण और सवर्णों के बीच में झगड़ा होता है,ब्राह्मणों-ठाकुरों के बीच में भी झगड़ा होता है। दलितों-दलितों के बीच में झगड़ा होता है कहाँ तक आप कानून बनाएंगे? तो भाईचारा स्थापित करिए और ये जो कानून है ये समाज को फाड़-फाड़ कर देगा。
इससे आने वाले समय में देश और राष्ट्र का बहुत नुकसान होगा समाज बांट जाएगा हाथ जोड़कर विनती है कृपया ऐसा कानून ना लाएं। कहने को तो बहुत कुछ इच्छा है बोला जा सकता है लेकिन बोलने की कोई आवश्यकता नहीं है इस कानून से यह बच्चे बंट जाएंगे यह यह जाति देखकर के दोस्ती करेंगे। जो लोग कानून लेकर के आए हैं मैं उनसे कहना चाहता हूं कि यह कानून समाज में भेदभाव पैदा करेगा यह बच्चे विभाजित हो जाएंगे। यहां हमारे देश के लिए अच्छा नहीं होगा वैसे मैं इस कानून में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का बयान सुना था उसमें संतुलन की बात कही गई है। लेकिन इस कानून में संतुलन नहीं है लेकिन आपने एक पक्ष को अपराधी बना करके खड़ा कर दिया है लेकिन अपने वकील का भी मौका नहीं दिया कि इनका वकील कौन होगा。
लेकिन जो गलत करता है उसको सजा मिलनी चाहिए चाहे वह क्षत्रिय समाज का हो चाहे ब्राह्मण समाज का हो चाहे किसी भी समाज का हो वह सजा का हकदार है। उसका हमारा कोई समाज समर्थन नहीं करेगा लेकिन आप बच्चों में भेदभाव मत पैदा करिए स्कूलों में आप भेदभाव मत पैदा करिए। मैं फिर दलित समाज के जो बच्चे पढ़े लिखे हैं मैं उनसे अपील करना चाहता हूं ओबीसी समाज के बच्चों से अपील करना चाहता हूं। यह देश हम सबका है इस देश में सौहार्द बनाए रखना हम सबकी जिम्मेदारी है कृपया ऐसे कानून का समर्थन न करें。
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