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हाईकोर्ट: पति की आय से भरण-पोषण तय नहीं, 8000 रुपए ही पर्याप्त
RKRakesh Kumar Bhardwaj
Feb 03, 2026 19:00:39
Jodhpur, Rajasthan
पति की कमाई पर हिस्सेदारी नहीं, सम्मानजनक गुज़ारे का अधिकार ही भरण-पोषण
57 दिन के विवाह में आय का बंटवारा नहीं बन सकता कानून का हथियार-जस्टिस फरजंद अली
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने भरण-पोषण कानून की सीमा और उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए एक अहम फैसला दिया है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि पति की अधिक आय का मतलब यह नहीं कि पत्नी को उसकी कमाई का तय प्रतिशत या बड़ा हिस्सा भरण-पोषण के रूप में दिया जाए। भरण-पोषण को आय या संपत्ति के बंटवारे का माध्यम नहीं बनाया जा सकता। जस्टिस फरजंद अली की बेंच ने पत्नी की ओर से दायर उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें फैमिली कोर्ट द्वारा तय किए गए 8,000 रुपये प्रति माह के भरण-पोषण को बढ़ाने की मांग की गई थी। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि यह राशि मामले के तथ्यों के अनुरूप है। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि भरण-पोषण का उद्देश्य किसी को आर्थिक लाभ पहुंचाना नहीं, बल्कि आश्रित जीवनसाथी को सम्मानजनक जीवन जीने में मदद देना है। यदि केवल पति की ऊंची आय के आधार पर पत्नी को उसकी कमाई का आधा या बड़ा हिस्सा दे दिया जाए, तो यह भरण-पोषण की कार्यवाही को संपत्ति या आय के विभाजन जैसा बना देगा, जो कानून की मंशा के विपरीत है। इस मामले में पति-पत्नी का वैवाहिक संबंध मात्र 57 दिनों तक ही रहा। हाईकोर्ट ने माना कि विवाह की अवधि अपने-आप में भरण-पोषण के अधिकार को खत्म नहीं करती, लेकिन निर्भरता, साझा जीवन-स्तर और भरण-पोषण की मात्रा तय करने में यह एक प्रासंगिक कारक जरूर है। इतने कम समय के सहजीवन में आय-स्तर की बराबरी का दावा तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने पत्नी की उच्च शैक्षणिक और पेशेवर योग्यता को भी ध्यान में रखा। न्यायालय ने कहा कि केवल यह कहना कि पत्नी फिलहाल बेरोजगार है, यह सिद्ध नहीं करता कि वह स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी दोहराया कि केवल कमाने की क्षमता होने से पत्नी भरण-पोषण से वंचित नहीं होती, लेकिन राशि तय करते समय उसकी योग्यता और संभावित आय को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि पति द्वारा नियमित रूप से भरण-पोषण की राशि जमा करना उसके जिम्मेदार और सद्भावनापूर्ण रवैये को दर्शाता है। कोर्ट के अनुसार, न्याय करते समय पक्षकारों के आचरण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि न्याय केवल कानून नहीं, बल्कि समानता और सद्भावना पर भी आधारित होता है। सभी तथ्यों, परिस्थितियों और कानूनी सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने पत्नी की याचिका खारिज कर दी और फैमिली कोर्ट द्वारा तय 8,000 रुपये प्रतिमाह की भरण-पोषण राशि को बरकरार रखा।
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