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संघ का विकास मॉडल चेतावनी: गरीब जनता अभी भी केंद्र में
VSVishnu Sharma
Jan 02, 2026 16:19:29
Jaipur, Rajasthan
वर्तमान विकास मॉडल पर चिंतित संघ, डॉ गोपाल कृष्ण बोले - भारत विकास तो कर रहा है, लेकिन बडा वर्ग अब भी गरीब है
भारत विकास तो कर रहा है, लेकिन भारत में बडा वर्ग अभी भी गरीब है। गरीबी आज भी देश के लिए गंभीर और चिंता जनक समस्या है। आर्थिक प्रगति के बावजूद समाज का बड़ा वर्ग सीमित आय और संसाधनों में जीवन यापन कर रहा है। विकास का लाभ कुछ गिने-चुने शहरों और क्षेत्रों तक सीमित होना गंभीर असंतुलन की ओर संकेत करता है।
मालवीय नगर पाथेय भवन में शुक्रवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सर संघचालक रज्जूभैय्या स्मृति में व्याख्यानमाला आयोजित की गई। स्व का बोध और विकास की अवधारणा विषय विषय पर आयोजित इस व्याख्यान माला में मुख्य वक्ता संघ के सह सरकार्यवाह डॉ गोपाल कृष्ण ने कहा भारत विकास तो कर रहा है, लेकिन भारत में बडा वर्ग अभी भी गरीब है। देश में 16 फीसदी की आमदनी पांच हजार रुपये है। वहीं 80 फीसदी की आमदनी 10-15 हजार तनख्वाह है। मात्र 25 फीसदी शहरों का विकास हो रहा है। विकास का ये मॉडल हमने कहां से लिया ? गांधी जी ऐसा विकास नहीं चाहते थे। ये मॉडल हमने उन देशों से लिया जहाँ पर दस फीसदी ग्रामीण आबादी है। साइंस, टेक्नोलॉजी, इंडस्ट्री, विज्ञापन ऐसा माहौल बनाती है जिससे, जिसके पास पैसा है, उसके पास पैसा आता है, ये केंद्रीकृत विकास है। विकास का ये मॉडल दुनिया में शांति लाने वाला नहीं है।
संघ सरकार्यवाह डॉ कृष्ण गोपाल ने कहा कि अंग्रेजों ने भ्रम पैदा किया भारत को सबसे बेकवर्ड बताया और कहा, हम लोग उद्योग ला रहे हैं, शिक्षा दे रहे हैं। 18 शताब्दी में विश्व की 30-35 आर्थिक हिस्सेदारी भारत की थी, लेकिन जब अंग्रेज गए तो महज ढाई फीसदी रह गई। भारत सोने- चांदी के अलावा सब कुछ निर्यात थी, लेकिन तब का ये भारत अब कैसा हो गया।
भारत ने विवाह व्यवस्था दी, जीरो, अंकगणित दिया, दशमलव दिया, वर्णमाला दी। विकास का अर्थ केवल आर्थिक समृद्धि नहीं है। वास्तविक विकास वही है, जिसमें मनुष्य, समाज, परिवार और प्रकृति का संतुलित उत्थान हो। उन्होंने कहा कि भारत की विकास अवधारणा आत्मकेंद्रित नहीं, बल्कि समाज केंद्रित रही है और आज के वैश्विक परिदृश्य में यही दृष्टि सबसे अधिक प्रासंगिक है।
डॉ. कृष्ण गोपाल ने कहा कि किसी भी राष्ट्र के लिए “स्व का बोध” अत्यंत आवश्यक है। जब तक यह स्पष्ट नहीं होगा कि हमारे पूर्वज कौन थे, हमारी संस्कृति, भाषा और साहित्य क्या है तथा जीवन और जगत को देखने की हमारी दृष्टि क्या रही है, तब तक विकास की दिशा सही नहीं हो सकती। भारत में जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का एक स्थायी उद्देश्य है, जिसे हमारी परंपरा ने निर्धारित किया है। यह उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उन्नति तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मिक साधना के साथ पूरे समाज और सृष्टि के हित से जुड़ा हुआ है। भारत की परंपरा में भौतिक और आध्यात्मिक दोनों का समन्वित विकास रहा है और यही इसकी हजारों वर्षों पुरानी पहचान है.
डॉ. कृष्ण गोपाल ने कहा कि भारत प्राचीन काल से ही वैभव सम्पन्न रहा है लेकिन उस वैभव का आधार केवल धन नहीं था। शिक्षा, ज्ञान, सामाजिक व्यवस्था, नैतिकता और सांस्कृतिक मूल्यों ने भारत को समृद्ध बनाया। उन्होंने कहा कि यह धारणा गलत है कि भारत हमेशा से गरीब रहा है; वास्तविकता यह है कि भारत ने लंबे समय तक वैश्विक आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन में अग्रणी भूमिका निभाई। केंद्रीकृत विकास मॉडल भारत जैसे देश के लिए उपयुक्त नहीं है। विज्ञान और तकनीक पर आधारित यह मॉडल संसाधनों और अवसरों को सीमित केंद्रों में समेट देता है, जिससे बेरोजगारी, असमानता और सामाजिक असंतोष बढ़ता है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ऐसा मॉडल न तो समाज में संतुलन स्थापित कर सकता है और न ही विश्व में शांति ला सकता है。
उन्होंने कहा कि भारत का विकास मॉडल परिवार केंद्रित होना चाहिए। भारतीय समाज में परिवार सामाजिक व्यवस्था की मूल इकाई रहा है, जहां व्यक्ति समाज से जुड़कर आगे बढ़ता है। आत्मकेंद्रित विकास मॉडल व्यक्ति को समाज से अलग करता है, जिससे मानसिक तनाव और सामाजिक विघटन बढ़ता है。
डॉ. कृष्ण गोपाल ने कहा कि विकास का उद्देश्य केवल आर्थिक आंकड़े बढ़ाना नहीं, बल्कि ऐसा समाज बनाना होना चाहिए, जहां शिक्षा, संस्कार, रोजगार और जीवन मूल्य समान रूप से विकसित हों। उन्होंने कहा कि विकेंद्रीकृत, समाज केंद्रित और मूल्य आधारित विकास ही भारत और विश्व के लिए स्थायी समाधान प्रस्तुत कर सकता है।
”भारतीय दृष्टि में नारी चिंतन” पुस्तक का हुआ विमोचन
कार्यक्रम में भारतीय संस्कृति में नारी की स्वतंत्रता, कर्तव्य, सृजनशीलता और उसकी आध्यात्मिक चेतना को रेखांकित करने वाली पुस्तक “भारतीय दृष्टि में नारी चिंतन” का विमोचन भी हुआ। पुस्तक में वैदिक, उपनिषदिक, रामायण–महाभारत, बौद्ध, जैन, संत तथा आधुनिक काल तक फैले नारी चिंतन को समग्र भारतीय परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया गया है। यह ग्रंथ पश्चिमी नारीवाद के टकरावपूर्ण दृष्टिकोण के स्थान पर संतुलित, सकारात्मक और सांस्कृतिक नारी दृष्टि को सामने रखता है। पुस्तक के संपादक बिरेन्द्र पाण्डेय ने बताया कि इक्कीसवीं शताब्दी में नारी विमर्श प्रायः संघर्ष, टकराव और प्रतिद्वंद्विता के स्वर में प्रस्तुत होता रहा है। इसके विपरीत यह ग्रंथ यह स्पष्ट करता है कि भारतीय दृष्टि में नारी और पुरुष विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक शक्ति और शिव की भाँति है।
बाइट - डॉ कृष्ण गोपाल , सह सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
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