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राजस्थान हाईकोर्ट ने जिरह में पिजन होल थ्योरी पर रोक लगाई
RKRakesh Kumar Bhardwaj
Feb 02, 2026 19:00:57
Jodhpur, Rajasthan
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने साक्ष्य कानून की व्याख्या करते हुए जिरह की प्रक्रिया में अपनाई जाने वाली भ्रामक तकनीकों पर स्पष्ट सीमा खींच दी है। न्यायाधीश संजीत पुरोहित ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी गवाह से जिरह के दौरान दस्तावेज़ का केवल हस्ताक्षर वाला हिस्सा दिखाकर शेष सामग्री छिपाना सामान्यतः स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने माना कि ऐसी पद्धति निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांतों के विपरीत है और इससे गवाह भ्रमित हो सकता है। यह मामला पाली स्थित मरुधर होटल से जुड़ी संपत्ति के विवाद से संबंधित है। याचिकाकर्ता राजेश कुमार ने संपत्ति को संयुक्त हिन्दू परिवार की बताते हुए घोषणा, बंटवारा और निषेधाज्ञा की मांग की थी। वाद के दौरान 23 जून 1988 की कथित पारिवारिक सुलह को प्रतिवादी पक्ष ने जाली करार देते हुए संपत्ति को संयुक्त पारिवारिक मानने से इनकार किया। मुकदमे में प्रतिवादी के गवाह की जिरह के दौरान वादी ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धाराओं 138 और 145 के तहत आवेदन देकर यह अनुमति चाही कि गवाह को दस्तावेज़ की पूरी सामग्री दिखाए बिना केवल हस्ताक्षर वाला भाग दिखाकर पहचान कराई जाए। इस तरीके को पिजन होल थ्योरी या विंडो मेथड बताया गया। अपर जिला न्यायाधीश, पाली ने 17 सितंबर 2025 को इस आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि जिरह में दस्तावेज़ दिखाया जाए तो पूरा दस्तावेज़ दिखाना आवश्यक है। बाद में दायर समान आवेदन को भी पुनरावृत्ति मानते हुए खारिज कर दिया गया और लगातार देरी के कारण जिरह का अधिकार बंद कर दिया गया। हाईकोर्ट ने साक्ष्य अधिनियम की धाराओं 45, 47, 67 और 73 सहित संबंधित प्रावधानों का परीक्षण करते हुए कहा कि कानून में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि केवल हस्ताक्षर दिखाकर शेष दस्तावेज़ छिपाया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि पिजन होल थ्योरी का सीमित उपयोग केवल तभी संभव है जब गवाह हस्तलेखन या हस्ताक्षर का विशेषज्ञ हो। वर्तमान मामले में गवाह विशेषज्ञ नहीं था और उसने स्वयं पूरा दस्तावेज़ देखे बिना हस्ताक्षर पहचानने में असमर्थता जताई थी।अदालत ने यह भी नोट किया कि वाद पिछले 20 वर्षों से लंबित है और बार-बार समान आवेदन देकर कार्यवाही में देरी करना प्रक्रिया का दुरुपयोग है। इन कारणों से हाईकोर्ट ने अधीनस्थ अदालत के आदेशों को सही ठहराते हुए रिट याचिका खारिज कर दी और कहा कि अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप तभी संभव है जब स्पष्ट अवैधता या गंभीर त्रुटि हो, जो इस मामले में नहीं पाई गई। अप्रार्थीगणों की ओर से अधिवक्ता राजेश परिहार ने पैरवी की।
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