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हाईकोर्ट ने डॉ अनामिका भारद्वाज के IPC आरोप रद्द कर PC-PNDT ट्रायल की अनुमति दी
RKRakesh Kumar Bhardwaj
Feb 19, 2026 17:45:26
Jodhpur, Rajasthan
जोधपुर राजस्थान हाईकोर्ट ने भ्रूण लिंग जांच (सेक्स डिटर्मिनेशन) से जुड़े एक चर्चित मामले में बांसवाड़ा की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अनामिका भारद्वाज को आंशिक राहत दी है। जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने सेशन न्यायाधीश, बांसवाड़ा द्वारा तय किए गए आईपीसी की धारा 315/511 और 120-बी के तहत लगाए गए आरोपों को निरस्त कर दिया। हालांकि, पीसीपीएनडीटी एक्ट के तहत अन्य धाराओं में मुकदमा जारी रहेगा। मामला वर्ष 2017 का है। 18 फरवरी 2017 को जयपुर स्थित पीसीपीएनडीटी ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन में एफआईआर दर्ज की गई थी। आरोप था कि डॉ. भारद्वाज अपने सेंटर पर एजेंट के माध्यम से अवैध भ्रूण लिंग जांच कर रही हैं। 17 फरवरी 2017 को डिकॉय ऑपरेशन किया गया, जिसमें टीम ने गर्भवती महिला बनकर जांच करवाई। छापे के दौरान डॉक्टर से 19 हजार रुपये और सह-आरोपी अनिला से 1 हजार रुपये बरामद किए गए। बाद में सह-आरोपी की मृत्यु होने पर उसके खिलाफ कार्यवाही समाप्त हो गई। सेशन कोर्ट ने 8 मई 2023 को पहली बार पीसीपीएनडीटी एक्ट के साथ आईपीसी की धारा 315/511 (भ्रूण हत्या का प्रयास) और 120-बी (साजिश) के तहत आरोप तय किए थे। डॉक्टर ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। 14 दिसंबर 2023 को हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया था कि आरोप तय करते समय कारण स्पष्ट करते हुए नया आदेश पारित करे। बावजूद इसके, 20 जनवरी 2024 को ट्रायल कोर्ट ने लगभग समान आदेश दोहराते हुए फिर वही आरोप तय कर दिए। इसके बाद डॉक्टर ने दोबारा हाईकोर्ट का रुख किया। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि केवल लिंग जांच की तैयारी या फीस लेना अपने-आप में यह साबित नहीं करता कि गर्भपात की साजिश रची गई थी या भ्रूण को जन्म से पहले मारने का प्रयास किया गया। रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह सिद्ध हो कि गर्भसमापन की प्रक्रिया शुरू की गई या उसकी ठोस तैयारी की गई। हाईकोर्ट ने अपने रिपोर्टेबल निर्णय में कहा कि ट्रायल कोर्ट अभियोजन का पोस्ट ऑफिस या माउथपीस नहीं बन सकता। आरोप तय करते समय अदालत को यह देखना आवश्यक है कि अपराध के सभी आवश्यक तत्व प्रथम दृष्टया मौजूद हों। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले डॉ आनन्द राय बनाम स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल आशंका या अनुमान के आधार पर गंभीर आपराधिक धाराएं नहीं जोड़ी जा सकतीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लिंग जांच और गर्भपात दो अलग चिकित्सीय प्रक्रियाएं हैं। केवल सेक्स डिटर्मिनेशन के आरोप से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि गर्भपात का प्रयास भी किया गया। हाईकोर्ट ने आईपीसी की धारा 315/511 और 120-बी के आरोप रद्द करते हुए मामला ट्रायल कोर्ट को वापस भेज दिया है, जहां पीसीपीएनडीटी एक्ट के तहत शेष आरोपों पर सुनवाई जारी रहेगी।
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