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भरमौर के धर्मराज मंदिर में कर्मों का हिसाब: चौरासी मंदिर परिसर की रहस्यमयी कचहरी
SPSomi Prakash Bhuveta
Jan 06, 2026 06:08:30
Chamba, Himachal Pradesh
एंकर
भरमौर स्थित धर्मराज मंदिर में होता है मनुष्यों के कर्मों का हिसाब
ऐतिहासिक चौरासी मंदिर परिसर भरमौर में स्थापित है विश्व का एकमात्र धर्मराज मंदिर
जहां आज भी मनुष्यों के कर्मों का फैसला करने के लिए लगती है धर्मराज की कचहरी
वीओ
चंबा। भरमौर स्थित ऐतिहासिक चौरासी मंदिर परिसर का धर्मराज मंदिर कई तरह के रहस्यों को समेटे है। यह विश्व का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां साक्षात धर्मराज विराजमान हैं और जहां आज भी जीवात्माओं के कर्मों का हिसाब होता है।
चौरासी मंदिर परिसर में धर्मराज मंदिर के ठीक सामने चित्रगुप्त का आसन स्थापित है। यही पर चित्रगुप्त सभी जीवों के कर्मों का पूरा लेखा-जोखा रखते हैं। इसी स्थान को धर्मराज की कचहरी कहा जाता है। यहां पर उल्टे पांवों के निशान बने हुए हैं, जिनके बारे में मान्यता है कि मृत्यु के बाद आत्माओं के पांव उल्टे हो जाते हैं और वे यहीं खड़े होकर अपने कर्मों का हिसाब देती हैं。
धर्मराज मंदिर में प्रवेश से पहले सीढ़ियों के पास एक गुप्त यंत्र स्थापित है। मान्यता है कि इसी गुप्त यंत्र के माध्यम से धर्मराज हर व्यक्ति के जीवन का लेखा-जोखा करते हैं। इसके साथ ही मंदिर के बगल में स्थित ढाई सीढ़ियां भी लोगों के आकर्षण का केंद्र हैं। इन्हें स्वर्ग का द्वार माना जाता है और ऐसा विश्वास है कि मृत्यु के बाद आत्माओं को दूसरे लोक की यात्रा इन्हीं सीढ़ियों से होकर करनी पड़ती है।
चौरासी मंदिर परिसर का निर्माण दसवीं शताब्दी से भी पहले किया गया था। इस परिसर में विभिन्न देवी-देवताओं के कुल 84 मंदिर स्थापित हैं, जो इसे एक प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र बनाते हैं।
जिस स्थान पर आज धर्मराज मंदिर स्थित है, वहां पहले टेढ़ा शिवलिंग स्थापित था। वर्ष 1950 के बाद यहां महाराज कृष्ण गिरि ने अपना आसन लगाया। बताया जाता है कि उस समय कुछ लोगों ने महात्मा के साथ मिलकर शिवलिंग को सीधा करने का प्रयास किया, लेकिन अंतहीन खुदाई के कारण यह कार्य रोकना पड़ा。
इसके पश्चात महाराज कृष्ण गिरि ने कई महीनों तक मंदिर के बाहर कठोर साधना की। साधना के दौरान उन्हें इस बात का दिव्य आभास हुआ कि यह स्थान वास्तव में धर्मराज की कचहरी है। महाराज कृष्ण गिरि का वर्ष 1962 में देहांत हो गया था और उनकी समाधि धर्मराज मंदिर के समीप ही बनाई गई है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि मंदिर परिसर में कई बार अजीब और रहस्यमयी ध्वनियां सुनाई देती हैं, जो किसी अदालत में चल रही बहस जैसी प्रतीत होती हैं। लोगों की गहरी आस्था है कि मृत्यु के बाद आत्माओं को धर्मराज की सीढ़ियों से होकर ही दूसरे लोक की यात्रा करनी पड़ती है, और वहीं उनके अच्छे-बुरे कर्मों का अंतिम निर्णय होता है।
भरमौर का यह धर्मराज मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, कर्म सिद्धांत और जीवन–मृत्यु के दर्शन को भी गहराई से दर्शाता है। यही कारण है कि चौरासी मंदिर परिसर आज भी श्रद्धालुओं, शोधकर्ताओं और पर्यटकों के लिए आस्था और रहस्य का अनोखा संगम बना हुआ है。
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