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तुलार गुफा: सालभर जलाभिषेक का अज्ञात स्रोत-आस्था से भरा रहस्यमय स्थल
RRRikeshwar Rana
Feb 14, 2026 06:31:14
Dantewada, Chhattisgarh
रहस्य - स्पेशल स्टोरी
ऐंकर - छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग अपने अनसुलझे रहस्यों के लिए पूरे देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक में प्रसिद्ध है। विश्व का सबसे लंबा चलने वाला पर्व बस्तर दशहरा भी यहीं मनाया जाता है। लेकिन बस्तर की पहचान सिर्फ दशहरे तक सीमित नहीं है — यहां की धरती अपने भीतर कई ऐसे रहस्य समेटे हुए है, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। आज हम आपको ऐसे ही एक रहस्यमयी स्थल के बारे में बता रहे हैं — एक ऐसी गुफा, जहां साल के बारहों महीने प्रकृति स्वयं शिव का जलाभिषेक करती है।-dंतेवाड़ा जिले के ऐतिहासिक नगर बारसूर में 11वीं से 13वीं शताब्दी के प्राचीन मंदिर आज भी इतिहास की गवाही देते हैं। वहीं दंतेवाड़ा, बीजापुर और नारायणपुर जिलों की सीमाओं से लगे दंतेवाड़ा ज़िले के बारसूर से करीब 30 किलोमीटर दूर घने जंगलों वाले अबूझमाड़ क्षेत्र के बीचों-बीच स्थित है रहस्यमयी तुलार गुफा। इस गुफा के प्रवेश द्वार पर भगवान शिव का शिवलिंग विराजमान है। आश्चर्य की बात यह है कि ऊपर से चट्टानों के बीच से लगातार पानी रिसता रहता है और सीधे शिवलिंग पर गिरता है। साल के 12 महीनों तक यह प्राकृतिक जलाभिषेक जारी रहता है। लेकिन यह पानी आता कहां से है — इसका स्रोत आज तक कोई नहीं जान पाया। मौसम के अनुसार जल का प्रवाह कम-ज्यादा होता रहता है, परंतु कभी पूरी तरह बंद नहीं होता।-रास्ता है कठिन
इस रहस्य की पड़ताल के लिए हमारी जी मीडिया की टीम बारसूर से मांगनार होते हुए गुफा गांव पहुंची। रास्ते में 2 से 3 नाले पड़ते हैं, जहां पानी अधिक होने पर वाहन पार कराना बेहद कठिन हो जाता है। हालांकि ग्रामीणों ने अब वहां जुगाड़ से पुल बना दिया है। ऊंचे-नीचे पहाड़ी रास्ते सफर को और चुनौतीपूर्ण बना देते हैं। लेकिन जैसे ही गुफा में महादेव के दर्शन होते हैं, सारी थकान मानो पलभर में दूर हो जाती है।
जनश्रुति क्या कहती है?
स्थानीय जनश्रुति के अनुसार, बाणासुर नामक राक्षस ने इसी गुफा में वर्षों तक तपस्या की थी। कहा जाता है कि उसी ने इस गुफा की रचना की थी। शिकार पर निकले ग्रामीणों ने सबसे पहले इस गुफा को देखा और तभी से यह स्थान बाहरी दुनिया की नजर में आया।
गुफा के भीतर लगभग 60 मीटर तक जाने पर घना अंधेरा छा जाता है। अंतिम छोर पर नंदी विराजमान हैं और आगे रास्ता बंद हो जाता है। ऊपर चढ़कर देखने पर सिर्फ विशाल चट्टानें और घने पेड़ नजर आते हैं — दूर-दूर तक पानी का कोई स्रोत दिखाई नहीं देता।
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, हर तीन वर्ष में माघ पूर्णिमा और महाशिवरात्रि से पहले पारंपरिक देवी-देवताओं और आंगा देवों को यहां स्नान कराया जाता है। इसके बाद ही गांवों में मेले का आयोजन होता है।
नक्सल प्रभावित और अंदरूनी क्षेत्र होने के कारण यह गुफा साल में केवल एक बार, महाशिवरात्रि के अवसर पर आम श्रद्धालुओं के लिए खुलती है। हजारों श्रद्धालु पदयात्रा कर यहां पहुंचते हैं, रात्रि विश्राम करते हैं और महाशिवरात्रि के दिन तुलार वाले बाबा के दर्शन कर मनोकामनाएं मांगते हैं।
बस्तर की रहस्यमयी धरती पर स्थित यह तुलार गुफा आज भी आस्था और रहस्य का अद्भुत संगम बनी हुई है।
तुलार गुफ़ा के विजुअल
बाइट भुनेश्वर भरद्वाज स्थानीय जानकार
बाइट - शिवकुमार मंडावी स्थानीय जानकार
बाइट - नरेंद्र नाग स्थानीय जानकार
ग्राउंड जीरो से 3 वॉक थ्रू अलग अलग एंगल से ।
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