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ED बनाम ममता बनर्जी: सुप्रीम कोर्ट में जवाब के साथ संघर्ष तेज
ASArvind Singh
Feb 18, 2026 18:16:43
Noida, Uttar Pradesh
ED ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाब में कहा है- ममता बनर्जी और बंगाल सरकार का यह कहना गलत है कि चूंकि IPAC रेड मामले में किसी के मूल अधिकार का हनन नहीं हुआ है, इसलिए ED की याचिका आर्टिकल 32 के तहत सुनवाई लायक नहीं है। कानून का शासन आर्टिकल 14 के तहत मौलिक अधिकार का हिस्सा है। इस मामले में ED अवैध खनन से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप की जांच कर रही है। मामला अवैध कोयला खनन से जुड़ा है। प्राकृतिक संसाधन जनता की संपत्ति हैं। यदि उनके अवैध दोहन से धन अर्जित कर उसे छुपाया जाता है, तो वास्तविक पीड़ित पूरी जनता होती है। ऐसे में अगर अपराध की सही और निष्पक्ष जांच नहीं होती है, तो यह जनता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। ममता बनर्जी और उनके अधिकारियों ने ED अधिकारियों और जनता के मौलिक अधिकार का हनन किया है। इसलिए ED ने आर्टिकल32 के तहत याचिका दायर की है। बंगाल सरकार का यह कहना कि मामले में विवादित तथ्य हैं इसलिए रिट याचिका में सुनवाई नहीं हो सकती, गलत है। ED अपनी याचिका के रखे गए तथ्यों पर सुप्रीम कोर्ट से कोई अंतिम फैसले नहीं मांग रही। ED का कहना है कि पहली नज़र में गंभीर अपराध का मामला बनता है। इसलिए मुख्यमंत्री और पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज कर CBI जांच होनी चाहिए। चूंकि इस केस में आरोप राज्य सरकार और राज्य पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों पर हैं, इसलिए निष्पक्ष जांच राज्य पुलिस से संभव नहीं है। बंगाल सरकार का कहना गलत है कि केंद्र और राज्य के बीच विवाद होने के चलते इस पर सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ आर्टिकल 131 के तहत सुनवाई हो सकती है। हकीकत में यह मामला संघीय ढांचे में केन्द्र -राज्य संबंधों के बीच विवाद का नहीं है। यह राज्य के अधिकारियों द्वारा सत्ता के दुरुपयोग और अपराध करने का है। इसलिए यह Article 131 के तहत नहीं बल्कि आर्टिकल 32 के तहत सुनवाई लायक है। कानून के मुताबिक FIR दर्ज करने या जांच के चरण पर आरोपी खुद का भी पक्ष सुने जाने के अधिकार का दावा नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में यह बात स्पष्ट की गई है। इसलिए अभी इस स्टेज पर ममता बनर्जी और राज्य के पुलिस अधिकारियों की कोई भूमिका नहीं है। बंगाल पुलिस की यह दलील गलत है कि वो इस बात की जांच कर रहे थे कि क्या सेंट्रल एजेंसी से होने का दावा कर फर्जी अधिकारी तो नहीं आये है! ED अधिकारियों ने अपना पहचान पत्र और सर्च वारंट दिखाया था। अगर पुलिस सच में फर्जी अधिकारियों वाले पहलू की जांच कर रही होती, तो वे पहले सर्च कर रहे अधिकारियों की पहचान की पुष्टि करते। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इसके बजाय पुलिस ने मुख्यमंत्री को वहां चल रहे सर्च के दौरान परिसर में एट्री करने में मदद की और वहां से डेटा ले जाने में साथ दिया। ED का कहना है कि जब उसकी सर्च चल रही थी, इस समय ममता बनर्जी परिसर में घुसी और बाद में जबरदस्ती वहां से डिजिटल डिवाइस और डॉक्यूमेंट लेकर चली गईं। ममता बनर्जी का यह दावा सत्य नहीं है कि उन्होंने परिसर में घुसने के लिए ED के अधिकारियों से आग्रह किया था और ED ने बिना किसी ऐतराज के उन्हें एट्री करने और डिवाइस ले जाने दिया। वास्तविकता यह है कि वे कानून प्रक्रिया को धता बताकर Z+ सुरक्षा कर्मियों, सादे कपड़ों में लोगों और कोलकाता पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ अंदर गईं। वहां सैकड़ों पुलिसकर्मियों की मौजूदगी ही इसलिए थी ताकि ED के अधिकारियों पर दबाव बनाया जा सके। उस समय डिजिटल बैकअप की प्रक्रिया चल रही थी, इसलिए ऐसी सूरत में ED द्वारा अपनी मर्जी से किसी भी डिजिटल सामग्री को ममता बनर्जी को सौंपने का सवाल ही नहीं उठता। ED ने अधिकारियों के अनुरोध को दरकिनार कर ममता बनर्जी दस्तावेज और डिजिटल सामग्री जबरन ले ली गई, जबकि ED अधिकारियों ने ऐसा न करने का अनुरोध किया था। ED का कहना है कि सर्च वाली जगह पर ममता बनर्जी का एंट्री करना और डिजिटल डिवाइस और डॉक्यूमेंट ले जाना न केवल जांच में बाधा डालने वाला है, बल्कि चोरी जैसे अन्य संज्ञेय अपराधों की कैटेगरी में भी आता है। ED ने अपने जवाब में ममता बनर्जी के इस दावे को खारिज किया है कि ED की रेड राजनीतिक वजह से प्रेरित थी और इसका मकसद टीएमसी पार्टी का चुनावी डेटा हासिल करना था। ED ने कहा कि उसकी कार्रवाई राजनीतिक नहीं होकर बल्कि कानून के तहत की गई वैध कार्रवाई है। उसने PMLA के तहत अधिकृत वारंट के आधार पर Indian PAC Consulting Pvt. Ltd. पर रेड की थी, न कि Indian Political Action Committee पर। इस आरोप का कोई आधार नहीं है कि ED ने इस रेड के जरिए TMC का चुनावी डेटा देखा。
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