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गैस सिलेंडर की कमी: हिमाचल के ढाबों में लकड़ी से खाना, कारोबार बचा
MTManish Thakur
Mar 14, 2026 10:22:11
Kullu, Himachal Pradesh
देश भर में गैस सिलेंडर की हालत को लेकर लोगों के बीच हड़कंप की स्थिति बनी हुई है। तो वहीं हिमाचल प्रदेश में भी लोग गैस सिलेंडर लेने के लिए लगातार गैस एजेंसी का रुख कर रहे हैं। हिमाचल प्रदेश के कई इलाकों में कमर्शियल गैस सिलेंडर की सप्लाई बंद हो चुकी है। जिससे होटलों तथा ढाबा संचालकों को खासी दिक्कतों का उठाना सामना करना पड़ रहा है। जिला कुल्लू की अगर बात करें तो यहां पर भी कमर्शियल गैस सिलेंडर की सप्लाई बंद हो गई है। ऐसे में शनिवार को जिला कुल्लू के कुल्लू, भुंतर, मनाली में 40% से अधिक होटल तथा ढाबे पूरी तरह से बंद रहे। जिसके चलते लोगों को खाना खाने के लिए भी जगह-जगह पर भटकना पड़ा। ऐसे में अगर आने वाले दिनों में कमर्शियल गैस सिलेंडर की सप्लाई शुरू नहीं हुई। तो इससे यहां होटल तथा ढाबों को कारोबार चौपट हो जाएगा और लोगों को भी परेशानी का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में कुल्लू जिला मुख्यालय ढालपुर की अगर बात करें तो यहां पर एक ढाबा करीब 100 साल से लकड़ी से ही खाना तैयार कर रहा है और गैस सिलेंडर की कमी के बीच भी उनका कारोबार रोजाना की तरह ही चल रहा है। यह ढाबा है ढालपुर में स्थित जनता ढाबा, जहां आज भी गैस सिलेंडर की बजाय लकड़ी से ही पूरा खाना तैयार किया जा रहा है।
जिला कुल्लू के मुख्यालय ढालपुर में जनता ढाबा के नाम से मशहूर यह ढाबा शनिवार को भी खुल रहा और यहां पर लोगों के लिए सारा दिन भोजन उपलब्ध रहा। इसका एक कारण यह भी रहा कि यहां पर चूल्हे पर लकड़ी जलाई जाती है और लकड़ी से ही पूरा खाना तैयार किया जाता है। ऐसा में आज भी इस ढाबे में पुरानी परंपरा के तहत पीतल के बर्तनों में खाना तैयार किया जाता है। लोग यहां पर शाकाहारी तथा मांसाहारी खाने का मजा लेने के लिए आते हैं। इस ढाबे में कभी-कभार ही गैस सिलेंडर का प्रयोग किया जाता है। जिसके चलते कमर्शियल गैस सिलेंडर के सप्लाई बंद होने के बाद भी ढाबे के कारोबार पर कोई असर नहीं पड़ा है।
ढाबा के संचालक युवा नितिन ने बताया कि उनका ढाबा 100 साल से भी अधिक पुराना है और पुराने समय से ही यहां पर लकड़ी से ही पूरा खाना तैयार किया जाता है। नितिन का कहना है कि उनके बुजुर्गों का मानना है कि लकड़ी के चूल्हे पर जो खाना बनता है। वह काफी स्वादिष्ट होता है और पुरानी परंपरा के तहत इस खाने को काफी शुद्ध भी माना गया है। ऐसे में वह आज भी लकड़ी से ही चूल्हा जलाते हैं और इसी पर पूरा खाना तैयार करते करते हैं।
नितिन ने बताया कि आज कमर्शियल गैस का सिलेंडर बाजार में 2000 रुपये से अधिक कीमत पर मिलता है। जबकि लकड़ी उन्हें वन विभाग के डिपो से 900 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से मिलती है। ढाबे में अगर खाना बनाने के लिए एक दिन की लकड़ी खर्च की जाए। तो रोजाना 1 क्विंटल लकड़ी चूल्हे पर जलाई जाती है। अगर सिलेंडर पर भी खाना तैयार करना हो तो एक सिलेंडर रोजाना खाना बनाने के लिए खर्च होता है। ऐसे में सिलेंडर की कीमत 2000 रुपए से अधिक है और लकड़ी की कीमत 900 रुपए। जिसके चलते सिलेंडर के मुकाबले उन्हें लकड़ी काफी सस्ती पड़ती है।
युवा नितिन का कहना है कि लकड़ी के लिए वह या तो अपने बगीचे पर निर्भर रहते हैं या फिर वन विभाग के द्वारा संचालित डिपो से उन्हें आसानी से मिल जाती है। कई बार ग्रामीण भी यहां लकड़ी बेचने के लिए आते हैं। तो उन्हें लकड़ी की दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ता है। वर्तमान में कमर्शियल गैस सिलेंडर की सप्लाई बंद हो गई है। ऐसे में अगर उनका ढाबा भी गैस सिलेंडर से चला होता। तो आज उन्हें भी अपना ढाबा बंद करने की नौबत आती है। लेकिन पुराने दौर से वह लकड़ी का ही प्रयोग कर रहे हैं और गैस सिलेंडर की कमी के बावजूद भी उन्हें किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ रहा है।
नितिन का कहना है कि सिलेंडर पर जो भी बर्तन खाना बनाने के लिए चढ़ाया जाता है। तो वह बहुत जल्दी खराब हो जाता है। क्योंकि सिलेंडर की तेज आंच से बर्तन जल्दी पिघलता हैं और वह जल्दी खराब हो जाते हैं। जबकि लकड़ी के चूल्हे पर धीमी आंच से खाना तैयार होता है और इससे बर्तन को भी कोई नुकसान नहीं होता है। गैस सिलेंडर पर जो बर्तन प्रयोग किया जाता है वह तीन या चार साल में बदलना पड़ता है। जबकि लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाने के लिए जो बर्तन चढ़ाया जाता है। वह 20 से 25 साल आसानी से चल पड़ता है।
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