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गोरखपुर सोलर सिटी बनेगा: 20 मेगावाट फ्लोटिंग प्लांट मंजूर
NTNagendra Tripathi
Mar 23, 2026 14:24:19
Gorakhpur, Uttar Pradesh
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर को सोलर सिटी बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में चिलुआताल में 20 मेगावाट क्षमता के फ्लोटिंग सोलर पावर प्लांट को मंजूरी दे दी गई है। यह परियोजना न केवल हरित ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देगी, बल्कि शहर की पारंपरिक बिजली पर निर्भरता भी कम करेगी।
यह फ्लोटिंग सोलर प्लांट करीब 80 एकड़ जल क्षेत्र में स्थापित किया जाएगा। यह क्षेत्र पर्यटन विभाग, राजस्व विभाग और हिंदुस्तान उर्वरक एवं रसायन लिमिटेड के अधीन है। परियोजना के लिए पर्यटन विभाग की लगभग 28 एकड़ भूमि कोल इंडिया लिमिटेड को निःशुल्क दी जाएगी। यह प्लांट जल सतह पर स्थापित होगा, जिससे भूमि की मूल प्रकृति में कोई बदलाव नहीं होगा और पर्यावरण संतुलन भी बना रहेगा।
इस परियोजना से हर साल करीब 33.29 मिलियन यूनिट हरित ऊर्जा का उत्पादन होगा, जिसे सीधे ग्रिड से जोड़ा जाएगा। इससे शहर की बिजली जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होगी।
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के मानकों के अनुसार, सोलर सिटी बनने के लिए अगले 5 वर्षों में पारंपरिक ऊर्जा खपत में कम से कम 10 प्रतिशत की कमी लाना जरूरी है। गोरखपुर के लिए यह लक्ष्य 121.8 मिलियन यूनिट अक्षय ऊर्जा उत्पादन का रखा गया है।
ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा के अनुसार प्रदेश में पहले से ही औरैया और खुर्जा में फ्लोटिंग सोलर प्लांट संचालित हो रहे हैं और गोरखपुर में यह नई परियोजना राज्य के हरित ऊर्जा मिशन को और मजबूत करेगी।
इस प्रोजेक्ट से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, निवेश आएगा और शहर को क्लीन एनर्जी हब के रूप में पहचान मिलेगी।
वहीं कैबिनेट ने नेयवेली उत्तर प्रदेश पावर लिमिटेड को आवंटित पछवारा साउथ कोल ब्लॉक के विकास के लिए 2242.90 करोड़ रुपये की परियोजना को भी मंजूरी दी है। यह कंपनी एनएलसी इंडिया लिमिटेड और उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन निगम का संयुक्त उपक्रम है।
इस कोल ब्लॉक से मिलने वाला कोयला घाटमपुर स्थित 3×660 मेगावाट तापीय विद्युत परियोजना में उपयोग होगा। इससे बिजली उत्पादन लागत में करीब 80 पैसे से 1 रुपये प्रति यूनिट तक की कमी आने की संभावना है।
यानी एक तरफ गोरखपुर सोलर सिटी बनकर हरित ऊर्जा में आगे बढ़ेगा, तो दूसरी ओर सस्ती बिजली के लिए कोयला परियोजनाएं भी रफ्तार पकड़ रही हैं। उत्तर प्रदेश में ऊर्जा क्षेत्र में यह दोहरी रणनीति विकास को नई दिशा देने वाली साबित हो सकती है।
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