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देपालपुर के धाकड़ सेरी में चकमक पत्थरों से होलिका दहन, परंपरा जीवित
YSYatnesh Sen
Mar 02, 2026 18:47:09
Indore, Madhya Pradesh
होली विशेष स्टोरी
आधुनिक दौर में आज भी आदिमानव काल की तरह होलिका दहन नोट – होली विशेष स्टोरी
एंकर- होली यानी आस्था, विश्वास और परंपरा का उत्सव। आज जहां आधुनिक भारत में डिजिटल इंडिया का दौर है वहीं आज भी प्राचीन पद्धति जीवंत है देशभर में होलिका दहन आधुनिक साधनों के साथ किया जाता है लेकिन मध्य प्रदेश के इंदौर जिले के देपालपुर का धाकड़ सेरी इलाका ऐसा है जहां 21वीं सदी में भी आग जलाने और उससे होलिका का दहन करने का तरीका हजारों साल पुराना है।
हम आपको लिए चलते हैं देपालपुर क्षेत्र की धाकड़ सेरी में जहां होलिका दहन के लिए माचिस या लाइटर नहीं बल्कि आज भी आदिमानव काल की तरह चकमक पत्थरों से अग्नि उत्पन्न की जाती है।
देखिए एक्सक्लूसिव ग्राउंड रिपोर्ट
वीओ 01 - ये तस्वीरें हैं मध्यप्रदेश के इंदौर जिले के देपालपुर मे स्थित धाकड़ सेरी इलाके की जहां परंपरा केवल निभाई नहीं जाती बल्कि जी भी जाती है।
ढलती शाम गांव के बुजुर्ग, बच्चे, महिलाए और बीच में सजकर तैयार होलिका। लेकिन असली दृश्य अब शुरू होता है क्योंकि यह आम तरह से रस्म अदायगी कर आधुनिक दौर की होलिका दहन नहीं बल्कि प्राचीन युग की परम्परागत तरीके से जलाई जाने वाली होलिका दहन प्रक्रिया है
वीओ 02.– इंदौर के देपालपुर की धाकड़ सेरी यहां होलिका दहन की शुरुआत होती है दो चकमक पत्थरों से… होलिका जलाने वाले पटेल इन पत्थरों को विशेष विधि से आपस में टकराते हैं… धीरे-धीरे एक चिंगारी निकलती है वही चिंगारी रुई को सुलगाती है रुई से घास से बनी ‘हिड’ को आग दी जाती है और फिर उसी पवित्र अग्नि से होलिका दहन संपन्न होता है।
यह प्रक्रिया देखने में भले सरल लगती हो लेकिन इसके पीछे वर्षों का अभ्यास और आस्था जुड़ी है। स्थानीय लोगों की माने तो उनका कहना है की यह परंपरा हमारे पूर्वजों से चली आ रही है। पहले के समय में माचिस नहीं होती थी। पत्थरों से ही आग जलाई जाती थी। हम आज भी उसी रीति को निभाते हैं।
स्थानीय पंडित नमन गुरु जी की माने तो यह दृश्य मानो आदिमानव काल की झलक देता है। प्राचीन काल में अग्नि प्राकृतिक रूप से उत्पन्न की جاتی थी। पत्थरों की चिंगारी कभी धोखा नहीं देती। यह शुद्ध और पवित्र मानी जाती है। यह परंपरा हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है।
वीओ 03-
जैसे ही होलिका प्रज्वलित होती है जयकारों की गूंज और ढोल की थाप आसमान तक पहुंचती है डिजिटल इंडिया के इस दौर मे जहां एक क्लिक पर सबकुछ उपलब्ध है वहीं देपालपुर की धाकड़ सेरी यह संदेश देती है कि आथुुनिकता अपनाइए लेकिन परंपराओं को मत छोड़िए। यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण है। पत्थरों से जलती यह होलिका हमें याद दिलाती है कि असली रोशनी बिजली की नहीं संस्कारों की होती है।
यत्नेश सेन जी मीडिया इंदौर
Wt – होलिका जलाने वाले रामकिशन पटेल और स्थानीय रमेश पटेल के साथ संवाददाता यत्नेश सेन
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