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18 लाख पैकेज छोड़कर आइसबर्ग लेट्यूस से करोड़पति बने कुरुक्षेत्र के किसान
DKDARSHAN KAIT
Mar 12, 2026 12:16:59
Kurukshetra, Haryana
कुरुक्षेत्र के किसान ने आज से करीब 23 साल पहले 18 लाख सालाना पैकेज वाले नौकरी छोड़कर शुरू की आइसबर्ग लेट्यूस की खेती, परिवार ने मना किया लेकिन नहीं मानी बात अब 80 एकड़ में कर रहे खेती, बड़े होटल और कई राज्यों में होती है सप्लाई।
खेती में अब नए-नए प्रयोग करके खेती को मुनाफे का सौदा बनाया जा रहा है लेकिन क्या आप सोच सकते हैं कि आज से करीब 23 साल पहले खेती में किसानों को कुछ नया मिल सकता था उस समय किसानों को कृषि यंत्रों और नई तकनीक का बहुत अभाव था लेकिन उस समय भी एक किसान ने खेती में कुछ ऐसे करके दिखाया जो सैकड़ो हजारों किसानों के लिए प्रेरणा बना और उनको एक नई खेती की तरफ लेकर गया। कुरुक्षेत्र के गौरीपुर गांव के किसान बिनवंत सिंह की कहानी एक ऐसी ही कहानी है जिसने "आइसबर्ग लेट्यूस" खेती करके भारत के किसानों को एक नई खेती से अवगत कराया।
2003 में 18 लाख सालाना पैकेज की नौकरी छोड़ शुरू की खेती
किसान बिनवंत सिंह ने बताया कि उन्होंने अपनी पढ़ाई लिखाई पूरी करने के बाद महाराष्ट में एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी मिल गई थी वहां पर उनको अच्छा पैकेज भी मिला हुआ था । लेकिन गांव में अपनी पुश्तैनी जमीन पर कुछ करने का जुनून उनके अंदर था उन्होंने इस जुनून के चलते एक अच्छी पैकेज की नौकरी जिसमें उन्हें 18 लाख रुपए सालाना पैकेज मिल रहा था। उसको छोड़कर अपने गांव चले आए और यहां पर पुश्तैनी जमीन पर खेती करने शुरू की।
नौकरी छोड़ने पर पिता हुए नाराज
उन्होंने बताया कि जब वह इतने अच्छे पैकेज वाली नौकरी छोड़कर अपने घर वापस लौट आए तब उनके पिता काफी नाराज हुए क्योंकि उनके पिता ने उनको बड़े अरमानों के साथ पढ़ाया लिखाया और नौकरी करने लायक बनाया लेकिन बेटा इतने अच्छे पैकेज की नौकरी छोड़कर वापस घर चला आया क्योंकि उस समय में 18 लाख रुपए सालाना पैकेज एक बहुत ही अच्छा पैकेज माना जाता था। लेकिन उन्होंने खेती के लिए उसको छोड़ दिया जिसे उनके पिता नाराज हुए उन्होंने कहा कि हम लोग भी अपनी कई पीढ़ियों से खेती करते आ रहे हैं खेती में कुछ नहीं बचता इसलिए तुम नौकरी करो लेकिन उन्होंने अपने पिता की बात नहीं मानी और खेती करने की ठान ली।
शुरू की आइसबर्ग लेट्यूस की खेती
उन्होंने बताया की शुरुआत में उन्होंने भी परंपरागत खेती को शुरू किया था लेकिन उसमें कुछ बचा नहीं है फिर कुछ अलग करने की सोची। उन दिनों मैकडॉनल्ड' कंपनी भारत में आई थी। उनको अपने फूड प्रॉडक्ट्स के लिए आइसबर्ग लेट्यूस चाहिए थे जिसके चलते उन्होंने उनसे संपर्क किया और उन्होंने कहा कि अगर वह उनके नॉर्म्स के अकॉर्डिंग अच्छी क्वालिटी के आइसबर्ग लेट्यूस उनको तैयार करके दे सकते हैं तो उस पर वह जरूर काम करें। लेकिन दो-तीन साल तक उसका हिसाब नहीं आया क्योंकि उस खेती की जानकारी उनको नहीं थी कि इसकी खेती कैसे करनी है इनको ही नहीं भारत में बहुत की कम लोग उसके बारे में जानते होंगे । जिसके चलते शुरुआत में उनको इस खेती के लिए काफी परेशानी हुई।
आइसबर्ग लेट्यूस की खेती के गुर सीखने गए विदेश
उन्होंने बताया कि जब वह इस खेती के बारे में भारत में कहीं से भी कुछ जानकारी नहीं प्राप्त कर पाए तब वह इस खेती के बारे में सीखने के लिए चीन में गए थे वहां पर अलग-अलग देश के काफी एक्सपर्ट लोग 11 दिन के एक सेमिनार में आए हुए थे जहां पर इस खेती को लेकर विस्तार से चर्चा की गई। उसके बाद फिर वह जापान , ऑस्ट्रेलिया, मेक्सिको , थाईलैंड और यूरोप जैसे काफी देश में गए और इस खेती की बारीकी को समझा और फिर उन्होंने इस खेती को करना सिखा।
अब 80 एकड़ में कर रहे आइसबर्ग लेट्यूस की खेती
उन्होंने बताया कि एक समय वह भी था जब वह इस खेती की एबीसी भी नहीं जानते थे लेकिन आज वही समय है जब वह इस खेती को 80 एकड़ में कर रहे हैं अब उनका विशेष टारगेट यही खेती रहता है और इसके ऊपर ही वह काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनके पास काफी किसान आते हैं और उनसे इस खेती के बारे में सीख कर जाते हैं और वह किसान भी इसको अपना रहे है लेकिन जब उन्होंने इस खेती की शुरुआत की थी तो वह उत्तर भारत ही नहीं भारत में भी सबसे पहले किसानों में से एक है जिन्होंने इस खेती की शुरुआत की थी। उनको यह सीखने के लिए बहुत परेशानी उठानी पड़ी।
बड़े होटल और दूसरे राज्यों में होता है सप्लाई
उन्होंने बताया कि उन्होंने इस खेती की शुरुआत McDonald विदेशी कंपनी के लिए की थी । उनके साथ उनका पिछले काफी सालों से कॉन्ट्रैक्ट है। जो उनके फूड प्रोडक्ट होते हैं उनमें वह आइसबर्ग लेट्यूस डालते हैं । उन्होंने कहा कि उनकी क्वालिटी काफी बेहतर होती है जिसके चलते वह पिछले काफी समय से उनके साथ बने हुए हैं। वह प्रोडक्शन से ज्यादा क्वालिटी पर विश्वास करते हैं क्योंकि क्वालिटी के आधार पर ही उनके प्रोडक्ट की डिमांड है। वह कई होटल और देश के कई राज्यों में इस सब्जी को सप्लाई कर रहे हैं।
सर्दियों की होती है यह खेती इसलिए गर्मियों में पहाड़ों में जाते हैं खेती करने
उन्होंने बताया कि यह खेती सर्दियों के मौसम की होती है इसके लिए अधिकतम तापमान 30 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए और न्यूनतम तापमान -5 डिग्री सेल्सियस तक होना चाहिए सर्दियों के समय में वह अपने फार्म पर इसको लगा देते हैं लेकिन उनके कस्टमर 12 के 12 महीने उनसे प्रोडक्ट मांगते हैं जिसके चलते वह सोलन और भी दूसरी जगह हिमाचल में आइसबर्ग लेट्यूस की खेती कर रहे हैं जिसे 12 के 12 महीने उनसे उनके कस्टमर जुड़े रहते हैं और उनका अच्छा काम चलता रहता है।
1 एकड़ से निकलती है करीब 9 टन प्रोडक्शन
उन्होंने बताया कि इसकी नर्सरी वह अब खुद तैयार करते हैं और पहाड़ों में भी उसको मौसम के अनुसार तैयार करके यहां पर लाया जाता है। करीब 1 महीने में नर्सरी तैयार हो जाती है और 1 एकड़ में 25 से 26000 पौधे आइसबर्ग लेट्यूस के लगाए जाते है। करीब यह दो महीने की फसल होती है जिसमें एक बार में 9 टन तक उत्पादन मिल जाता है। इसलिए कुछ खेतों में वह इस फसल को रिपीट भी करते हैं जिसे वह अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। उन्होंने बताया कि एक एकड़ में फसल लगाने से लेकर प्रोडक्शन आने तक एक लाख 20 हजार रुपए खर्च होता है। जबकि एक एकड़ से सवा दो लाख रुपए से लेकर ढाई लाख तक सब्जी निकल जाती है।
सब्जी की गुणवत्ता बरकरार रखने के लिए फार्म पर लगाया है वैक्यूम प्रीकुलर सिस्टम
उन्होंने बताया कि सब्जी लगाने वाले किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या है कि उनकी सब्जी बहुत ही जल्दी खराब हो जाती है सरकारी रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार 35% सब्जी भारत में ऐसे ही किसानों के खराब हो जाती है लेकिन उस पर उन्होंने काम किया है और उन्होंने नॉर्थ इंडिया का सबसे पहले वैक्यूमप्री कूलर सिस्टम अपने फार्म पर लगाया हुआ है। जहां पर सब्जियों को खेत से निकलने के बाद उसके अंदर रखा जाता है और 20 मिनट में ही सब्जी का टेंपरेचर चार डिग्री सेल्सियस तक लेकर आया जाता है और उसके बाद उसको कोल्ड स्टोर में लगाया जाता है और फिर फ्रीजर वाले व्हीकल पर उनको ट्रांसपोर्ट के जरिए भेजा जाता जिससे उनके जल्दी खराब होने के आशंका बहुत ही कम होती है और उसकी लाइफ कुछ दिन बढ़ जाती है ।
अपने फार्म पर 30 से 40 लोगों को दिया रोजगार
उन्होंने बताया कि उनके फार्म पर परमानेंट 10 लोगों की टीम काम करती है। वहीं डेली मजदूरी पर करीब 30 से 40 महिलाएं काम करती हैं। उनके फार्म पर काम करने वाली मजदूर महिला सीमा और उर्मिला ने बताया कि वह इसी गांव की रहने वाली है जो उनके खेतों में मजदूरी का काम करती हैं काम भी बिल्कुल आसान होता है जिसमें सब्जियों काट कर पैकिंग करनी होती है। ऐसे ही उनके साथ करीब 30 से 40 महिलाएं काम करती हैं जिनके उनके परिवारों की रोजी-रोटी इनके जरिए चल रही है। महिलाओं को काम करने के लिए कहीं दूर नहीं जाना पड़ता। उन्होंने बताया कि जब सीजन पूरे पिक पर होता है तब 50 से 60 लोगों को बेरोजगार मिल जाता है।
यह किसान बिनवंत सिंह की कहानी है जिन्होंने एक अच्छी नौकरी छोड़कर खेती को चुना था और पिता ने उनको बहुत समझाया की खेती में कुछ नहीं है लेकिन उन्होंने एक नई खेती को भारत में शुरू करने का जोखिम उठाया जिसके चलते अब वह करोड़ों रुपए कमा रहे हैं। इस खेती के बारे में दूसरे किसानों को भी जानकारी देकर उनको भी प्रेरित कर रहे हैं।
बाइट किसान बिनवंत सिंह
बाइट सीमा महिला मजदूर
बाइट उर्मिला महिला मजदूर
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