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नारायणपुर में माता मावली मेला 800 वर्षो के इतिहास के साथ शुरू
HSHEMANT SANCHETI
Feb 11, 2026 11:45:56
Narayanpur, Chhattisgarh
एंकर
नारायणपुर जिले में विश्व प्रसिद्ध 5 दिवसीय माता मावली मेला का शुभारंभ आज 800 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक “मावली परघाव” की पारंपरिक रस्म अदायगी के साथ हुआ। 11 फरवरी से 15 फरवरी तक चलने वाले इस मेले की शुरुआत मावली मंदिर परिसर में विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर की गई। सदियों से चली आ रही इस परंपरा में देवी-देवताओं, आंगादेव और क्षेत्र के पुजारियों की विशेष भूमिका रहती है। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और ग्रामीणों की उपस्थिति में माता मावली से सुख-समृद्धि और शांति का आशीर्वाद लिया गया।
परघाव की रस्म मावली मंदिर से प्रारंभ होकर पारंपरिक जुलूस के रूप में बुधवारी बाजार तक पहुंची, जहां देवी-देवताओं का मिलन हुआ। इसके बाद पूरा जुलूस मेला स्थल स्थित आड़मावली मंदिर पहुंचा, जहां ढाई परिक्रमा कर मावली परघाव की रस्म पूर्ण की गई। इस दौरान पारंपरिक वेशभूषा में सजे ग्रामीण, देवी-देवताओं की अगुवाई करते आंगादेव, ढोल-नगाड़ों की गूंज और लोकगीतों की मधुर धुनों ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया। जगह-जगह देवी-देवताओं का मिलन और नृत्य-गान का सिलसिला चलता रहा, जो इस मेले की विशिष्ट पहचान है।
रस्म पूरी होने के बाद सभी देवी-देवताओं को पुनः मावली मंदिर लाया गया, जहां श्रीफल अर्पित कर उन्हें ससम्मान विदाई दी गई। यह परंपरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक अस्मिता और सामाजिक एकता का प्रतीक है। 800 वर्षों से चली आ रही यह रस्म आज भी उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जा रही है, जो इसकी ऐतिहासिक महत्ता को दर्शाती है।
मावली मेला कभी अपनी भव्यता और सांस्कृतिक विविधता के लिए देश-विदेश तक प्रसिद्ध था। महाराष्ट्र सहित छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों से हजारों लोग यहां पहुंचते थे। खासकर अबूझमाड़ क्षेत्र के ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी मेले की रौनक को चार चांद लगा देती थी। लेकिन बीते वर्षों में नक्सल प्रभावित परिस्थितियों के चलते अबूझमाड़ के ग्रामीणों की भागीदारी कम हो गई, जिससे मेले की चमक फीकी पड़ने लगी थी।
इस वर्ष स्थिति बदली हुई नजर आ रही है। अबूझमाड़ क्षेत्र में शांति की बहाली और नक्सल प्रभाव में कमी के साथ ग्रामीणों का उत्साह फिर से लौटता दिख रहा है। मेले से एक दिन पहले मंगलवार रात को अबूझमाड़ के ग्रामीण ढोल-नगाड़ों की थाप पर बेखौफ होकर नाचते-गाते नजर आए। यह दृश्य 1990 के दशक की यादें ताजा करता दिखा, जब मावली मेला अपनी चरम रौनक पर हुआ करता था। ग्रामीणों की बढ़ती सहभागिता से इस बार मेले में पुरानी चमक लौटने की उम्मीद जगी है।
मेले की व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के लिए नगर पालिका द्वारा विशेष तैयारी की गई है। दुकानों का सुव्यवस्थित आवंटन किया गया है, ताकि व्यापारियों और आगंतुकों को किसी प्रकार की असुविधा न हो। मेला स्थल पर पर्याप्त रोशनी और स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है। साफ-सफाई और यातायात प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण सुरक्षा व्यवस्था भी कड़ी रखी गई है। पुलिस और सुरक्षा बलों की तैनाती मेला परिसर और आसपास के क्षेत्रों में की गई है, ताकि श्रद्धालु बिना किसी भय के मेले का आनंद ले सकें। सुरक्षा एजेंसियां लगातार निगरानी बनाए हुए हैं, जिससे आयोजन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सके।
मावली मेला केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं, बल्कि सामाजिक सद्भाव, परंपरा और लोक संस्कृति का जीवंत उत्सव है। यहां आदिवासी परंपराएं, लोकनृत्य, लोकसंगीत और पारंपरिक रीति-रिवाज एक साथ देखने को मिलते हैं। यह मेला क्षेत्रीय पहचान और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का माध्यम भी है।
800 वर्ष पुरानी इस ऐतिहासिक परंपरा का निर्वहन आज भी पूरे श्रद्धा भाव से किया जा रहा है। अबूझमाड़ में शांति की बहाली के बाद ग्रामीणों की बढ़ती भागीदारी से मेले की धूमिल छवि के फिर से निखरने की उम्मीद सभी के मन में है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या माता मावली का यह ऐतिहासिक मेला अपनी पुरानी भव्यता और रौनक को पूरी तरह वापस हासिल कर पाता है। फिलहाल, श्रद्धा, उत्साह और उम्मीद के साथ नारायणपुर में माता मावली मेला अपने पूरे रंग में नजर आ रहा है।
बाइट 01 हीरासिंह देहारी, देव समिति सदस्य
बाइट 02 अर्जुन देवांगन, देव समिति सदस्य
बाइट 03 भोला राम बघेल, देव समिति सदस्य
बाइट 04 इंद्रप्रसाद बघेल, अध्यक्ष नगर पालिका
बाइट 05 बंटी साहू, स्थानीय
पीटीसी देवी देवताओ के मिलन और खेल के दौरान
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