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धरोहर समिति के देसी धान बीज संरक्षण से बस्तर में जैविक खेती की राह
CJCHAMPESH JOSHI
Jan 28, 2026 07:09:18
Kondagaon, Chhattisgarh
कृषि मंत्रालय, नई दिल्ली द्वारा वर्ष 2016 में धरोहर समिति को प्रशस्ति पत्र और 10 लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि प्रदान की गई।
धरोवर समिति का मकसद एक है विलुप्त हो रही प्राकृतिक धान की किस्मो को बचाने के साथ किसानों को रासायनिक खेती छोड़ परम्परागात देशी खेती के लिए प्रेरित करना जिससे भूमि बंजर होने से बचे उर्वरकता शक्ति बड़े इसमें सफल हो भी हो रहा इनका प्रयास
इसके लिए समिति के प्रयास को देखते हुए कृषि मंत्रालय, नई दिल्ली द्वारा वर्ष 2016 में धरोहर समिति को प्रशस्ति पत्र और 10 लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि भी प्रदान की है ।
छत्तीसगढ़ को यूं ही धान का कटोरा नहीं कहा जाता है लेकिन बस्तर जैसे आदिवासी अंचल में आज यह पहचान खतरे में है। अधिक उत्पादन के लालच में हाईब्रिड धान की बढ़ती खेती ने पारंपरिक देसी प्रजातियों को विलुप्ति के कगार पर ला खड़ा किया है।
ऐसे समय में कोंडागांव के किसान शिवनाथ यादव और उनकी ‘धरोहर समिति’ उम्मीद की एक मजबूत मिसाल बनकर सामने आए हैं।
करीब 25 वर्षों की निरंतर मेहनत से शिवनाथ यादव ने धान की 290 देसी और विलुप्त होती किस्मों को सहेज कर रखा है, जबकि 44 किस्मों पर उनका शोध अभी भी जारी है। यह काम केवल बीज संग्रहण तक सीमित नहीं, बल्कि पारंपरिक ज्ञान, पर्यावरण संरक्षण और किसानों के अधिकारों की रक्षा से जुड़ा एक व्यापक आंदोलन है।
प्रेरणा से आंदोलन तक
शिवनाथ यादव को देसी बीजों के संरक्षण की प्रेरणा मुंबई की स्वयंसेवी संस्था रूरल कम्यूनस के फाउंडर स्व. मुन्नीर से मिली। इसी प्रेरणा के साथ उन्होंने वर्ष 1995 में कोंडागांव के गोलावंड में किसानों का समूह बनाकर ‘धरोहर’ की नींव रखी। तब से लेकर आज तक यह समूह देसी बीजों के संरक्षण और संवर्धन में जुटा है।
उनके इस उल्लेखनीय कार्य को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली। पौधा किस्म एवं कृषक अधिकार प्राधिकरण, कृषि मंत्रालय, नई दिल्ली द्वारा वर्ष 2016 में धरोहर समिति को प्रशस्ति पत्र और 10 लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि प्रदान की गई।
बेचते नहीं, बांटते हैं बीज
धरोहर समिति की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बीजों का व्यापार नहीं करती। शिवनाथ और उनका समूह बीजों की अदला-बदली करता है और किसानों को खुद बीज उत्पादन के लिए प्रेरित करता है। पारंपरिक ज्ञान के साथ-साथ कृषि वैज्ञानिकों का सहयोग लेकर धान की किस्मों को संरक्षित किया जा रहा है।
शिवनाथ यादव बताते हैं,
“पहले किसान जमीन की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग किस्म का धान बोते थे। गोबर की खाद और प्राकृतिक तरीकों से कीट नियंत्रण होता था, जिससे पर्यावरण का संतुलन बना रहता था। आज अधिक उत्पादन की होड़ में रासायनिक खाद और दवाओं का अत्यधिक उपयोग हो रहा है, जिसका असर पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों पर पड़ रहा है。”
देसी धान: पोषण भी, औषधि भी
शिवनाथ यादव के अनुसार देसी धान की कई किस्में पोषक तत्वों और औषधीय गुणों से भरपूर हैं।
काटा मैहर धान में प्राकृतिक रूप से आयरन पाए जाने की बात पारंपरिक ज्ञान में मिलती है।
इलायची आलचा जैसी किस्में दवाई के रूप में उपयोग की जाती रही हैं。
सुगंधित और विशेष किस्मों में —
पतला श्रेणी: बादशाहभोग, लोकटी माछी
मोटा श्रेणी: दांदर, कुमड़ा फूल, कुकड़ी मुंही, अलसागार, बासमुही
अर्ली वैरायटी: भूरसी, लालू-14, धंगढ़ी काजर
सहित अनेक किस्में शामिल हैं, जिन पर शोध जारी है।
जैविक खेती की बढ़ती संभावनाएं
आज देश-विदेश में ब्लैक राइस, रेड राइस और पोषक तत्वों से भरपूर देसी चावल की मांग बढ़ रही है। इससे बस्तर अंचल में जैविक खेती और किसानों की आय बढ़ाने की नई संभावनाएं बन रही हैं। शिवनाथ यादव का मानना है कि यदि देसी बीजों को संरक्षित कर उन्हें बाजार से जोड़ा जाए, तो यह क्षेत्र आत्मनिर्भर कृषि की मिसाल बन सकता है।
विरासत को बचाने की जंग
धरोहर समिति का यह प्रयास सिर्फ खेती नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए खाद्य सुरक्षा और जैव विविधता को बचाने की लड़ाई है। शिवनाथ यादव जैसे किसानों की मेहनत यह साबित करती है कि अगर संकल्प मजबूत हो, तो विलुप्त होती विरासत को भी फिर से जीवन दिया जा सकता है।
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FollowJan 28, 2026 08:34:28New Delhi, Delhi:महाराष्ट्र और देश में घिनौनी राजनीति हो रही है। हम भी चाहते इस घटना की पूरी जांच होनी चाहिए
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