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राजस्थान के अधिकांश नगरीय निकाय निर्वाचित बोर्ड के बिना प्रशासनिक शासन की ओर
DGDeepak Goyal
Jan 02, 2026 08:20:16
Jaipur, Rajasthan
राजस्थान की शहरी राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां लोकतंत्र की जगह प्रशासनिक व्यवस्था लेने जा रही है۔ जनवरी खत्म होते-होते प्रदेश के 90 चुने हुए नगरीय निकायों का कार्यकाल समाप्त हो जाएगा और इसके साथ ही शहरों की कमान पूरी तरह अफसरशाही के हाथों में चली जाएगी। फरवरी में आखिरी बचा हुआ निकाय भी खत्म हो जाएगा। यानी प्रदेश के इतिहास में पहली बार ऐसा होगा, जब लगभग सभी शहरी निकाय बिना निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के चलेंगे। इसके अलावा नवगठित निकायों को छोड़ दें, तो प्रदेश के सभी 196 नगरीय निकायों में कोई भी निर्वाचित बोर्ड नहीं बचेगा। यानी शहरी सरकार की कमान पूरी तरह प्रशासकों (अफसरों) के भरोसे होगी। प्रदेश के इतिहास में पहली बार ऐसी स्थिति बनेगी, जब (नवगठित निकायों को छोड़कर) सभी 196 नगरीय निकायों में निर्वाचित बोर्ड नहीं रहेंगे। अभी तक 105 नगरीय निकायों में प्रशासक नियुक्त हैं। जबकि नवगठित 113 निकायों में की बागडोर पहले से ही प्रशासकों के हाथ में है...पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार में 196 नगरीय निकायों में चुनाव हुए थे। सबसे बड़ा सवाल यही है कि चुनाव आखिर कब होंगे। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ही सरकार को अप्रैल तक नगरीय निकाय चुनाव कराने के निर्देश दे चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद सरकार की ओर से अब तक चुनाव को लेकर कोई स्पष्ट रोडमैप सामने नहीं आया है। इसी अनिश्चितता ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। विपक्ष सरकार पर आरोप लगा रहा है कि चुनाव जानबूझकर टाले जा रहे हैं, ताकि स्थानीय स्तर पर राजनीतिक जवाबदेही से बचा सके। इसके बाद स्थानीय राजनीति और आम जनता पर प्रशासक व्यवस्था का सबसे बड़ा असर दिखाई दे रहा है। जनता की चिंता यह है कि अब रोजमर्रा की समस्याएं लेकर किसके पास जाएं। कार्यकाल खत्म होने के साथ वार्ड पार्षद और चेयरमैन, मेयर तक पहुंच खत्म हो चुकी है। विकास कार्यों और नीतिगत फैसले अब निर्वाचित प्रतिनिधियों की बजाय प्रशासनिक अधिकारी कर रहे हैं, जिससे आम नागरिक खुद को व्यवस्था से कटता हुआ महसूस कर रहा है। कार्यकाल खत्म होने वाले निकायों की बात करें तो अजमेर जिले में (5), बांसवाड़ा (1), बीकानेर (3), भीलवाड़ा (7), बूंदी (6), प्रतापगढ़ (2), चित्तौड़गढ़ (3), चूरू (8), डूंगरपुर (2), हनुमानगढ़ (5), जैसलमेर (1), जालौर (1), झालावाड़ (5), झुंझुनूं (8), नागौर (9), पाली (7), राजसमंद (2), सीकर (7), टोंक (5) और उदयपुर (3) निकाय शामिल है। इसके अलावा काग़ज़ों में यह महज़ कार्यकाल की समाप्ति है, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त में यह लोकतंत्र की सबसे नज़दीकी सरकार के ठहराव की कहानी है। प्रदेश के शहर अब ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जहां चुने हुए प्रतिनिधियों की जगह फाइलें और फैसले अफसरों के हाथों में हैं। अदालतों के आदेश, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और जनता की बढ़ती बेचैनी के बीच सवाल वही है कि शहरी लोकतंत्र का यह खालीपन कब तक भरा जाएगा…और क्या जनता को फिर से अपनी आवाज़ चुनने का हक़ समय पर मिलेगा?
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