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राज्यपाल ने गहलोत सरकार के बिल लौटाए; विपक्ष ने त्वरित कार्रवाई की मांग
BDBabulal Dhayal
Jan 28, 2026 17:46:25
Jaipur, Rajasthan
गहलोत सरकार के बहुचर्चित विधेयकों को राज्यपाल ने लौटाया
लोकभवन में राज्यपाल की अनुमति की बाट जोह रहे गहलोत राज के 09 विधेयकों को राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने पुनर्विचार के लिए वापस लौटा दिया है। इनमेंऑनर किलिंग और मॉब लिंचिंग से जुड़े बिल भी शामिल हैं। 2 निजी विश्वविद्यालयों के विधेयक भी राज्यपाल ने वापस भेज दिए हैं
इन विधेयकों को लौटाया राज्यपाल ने
1.
राजस्थान लिंचिंग से संरक्षण विधेयक-2019
2.
राजस्थान परंपरा के नाम पर वैवाहिक संबंधों की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप का प्रतिषेध विधेयक-2019
3.
कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य ( संवर्धन और सरलीकरण) (राजस्थान संशोधन) विधेयक-2020
4.
कषक ( सशक्तीकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और क्षि सेवा पर करार (राजस्थान संशोधन) विधेयक- 2020
5.
आवश्यक वस्तु (विशेष उपबंध और राजस्थान संशोधन) विधेयक-2020
6.
व्यास विद्यापीठ विश्वविद्यालय जोधपुर विधेयक-2022
7.
सौरभ विश्वविद्यालय. हिंडौन सिटी (करौली) विधेयक-2022
8.
राजस्थान विद्युत (शुल्क) विधेयक-2023
9.
नाथद्वारा मंदिर ( संशोधन) विधेयक- 2023
कानूनी पहलुओं पर उठाए सवाल
राज्यपाल ने इन बिलों के कानूनी पहलुओं पर सवाल उठाते हुए वापस भेजा है। आज अभिभाषण के बाद स्पीकर वासुदेव देवनानी ने सदन को बिलों के वापस लौटने की जानकारी दी साल 2019 से लेकर 2023 में गहलोत सरकार के समय इन बिलों को पारित किया गया था।
गहलोत सरकार ने ऑनर किलिंग पर उम्रकैद और पांच लाख जुर्माने का प्रावधान किया था। मॉब लिंचिंग पर भी तत्कालीन गहलोत सरकार ने कड़ी सजा का प्रावधान किया था।इन दोनों ही बिलों के कई प्रावधान पहले से आईपीसी में थे। राज्यपाल ने इन बिल के प्रावधान केंद्रीय कानूनों से टकराव के कारण लौटाए हैं। गहलोत राज में पारित दो प्राइवेट यूनिवर्सिटी के बिल के प्रावधानों पर सवाल उठाते हुए लौटाया है।
केंद्र के कृषि कानूनों के विरोध में लाए गए बिल भी लौटाए
तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के जवाब में कांग्रेस ने देशभर में अभियान चलाया था। उस समय गहलोत सरकार केंद्रीय कृषि कानूनों की काट के तौर पर 2 नवंबर 2020 को कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) (राजस्थान संशोधन) विधेयक-2020 और कृषक (सशक्तीकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार (राजस्थान संशोधन) विधेयक लेकर आई थी। 2 नवंबर 2020 को दोनों बिल ध्वनिमत से पारित हुए थे。
बाद में केंद्र सरकार ने कृषि कानून वापस ले लिए थे। केंद्रीय कानून के जवाब में राज्य के कानूनों की वैधानिकता पर उस समय भी सवाल उठे थे। केंद्र के कानून वापस लेने के बाद इन दोनों बिल का कोई औचित्य नहीं रह गया था। राज्यपाल ने दोनों बिल के कानूनी आधार और औचित्य नहीं होने का तर्क देते हुए वापस भेजा है।
मॉब लिंचिंग विरोधी बिल भी हुआ वापस
राजस्थान सम्मान और परंपरा के नाम पर वैवाहिक संबंधों की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप का प्रतिषेध विधेयक को राष्ट्रपति के पास अनुमति के लिए भेजने के लिए राज्यपाल के पास लंबित था। राज्यपाल ने विधानसभा को बिल लौटाते हुए सरकार की तरफ से इसे वापस लेने के कारण गिनाए हैं
पहले भी लौटाते जाते रहे हैं बिल
ये कोई पहला मौका नहीं है जब राज्यपाल की मंजूरी के बिना ही बिलों को वापस लौटा दिया गया हो।
राज्यपाल पहले भी इस तरह के बिल लौटाते रहे हैं। अगर राज्य के किसी बिल के प्रावधान केंद्रीय कानूनों के प्रावधानों से टकराते हैं तो राज्यपाल इन्हें वापस भेज देते हैं। केंद्र और राज्य के बीच कानून बनाने को लेकर साफ प्रावधान है। राज्य केवल राज्य सूची के विषयों पर ही कानून बना सकते हैं। समवर्ती सूची में केंद्र और राज्य, दोनों कानून बना सकते हैं, लेकिन यहां भी केंद्रीय कानून ही मान्य होंगे। कई बार केंद्र और राज्य में अलग अलग दलों की सरकारें होने पर राज्यपाल का झुकाव केंद्र की तरफ होता है। इससे भी बिलों को लेकर लिए जाने वाले फैसले प्रभावित होते हैं। सूबे में भाजपा की सरकार है। जब इन बिलों को पारित किया गया था। तब भाजपा ने विधानसभा में इनका विरोध भी किया था। सत्ता बदलने के बाद बिलों को लौटाना इससे भी जोड़कर देखा जा रहा है।
कानून के लिए राज्यपाल की मंजूरी जरूरी।
विधानसभा से पारित कोई भी बिल राज्यपाल से मंजूरी मिलने के बाद ही कानून बनता है। राज्यपाल कानूनी, संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देकर बिल लौटा सकते हैं। राज्यपाल को बिल विधानसभा से मंजूरी के लिए भेजे जाते हैं, इसलिए लौटाया भी विधानसभा को जाता है। राज्यपाल के बिल रोकने की समय सीमा नहीं है। इसे लेकर कई बार कानूनी बहस भी छिड़ती रही है। बिल के प्रावधानों पर विधानसभा के जरिए सरकार से राज्यपाल स्पष्टीकरण मांग सकते हैं। हाल ही में तमिलनाडु सरकार के बिलों को लेकर काफी बहस हुई थी। सुप्रीम कोर्ट भी इस बारे में कई बार राज्यपालों को कानूनों प्रावधानों का पालन करने की हिदायत दे चुका है
बाबूलाल धायल जी मीडिया जयपुर
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