456010बलिदान की मिट्टी से इतिहास का तिलक: डॉ नारायण व्यास की विरासत
ASANIMESH SINGH
Jan 26, 2026 07:37:21
Ujjain, Madhya Pradesh
बलिदान की मिट्टी से इतिहास का तिलक उज्जैन के आर्कियोलॉजिस्ट डॉ. नारायण व्यास की अद्भुत देशभक्ति विरासत
देश के शहीदों और महापुरुषों के जन्म व बलिदान स्थलों की मिट्टी संजोकर डॉ. नारायण व्यास ने तैयार किया जीवंत इतिहास संग्रह
तिरंगा और त्याग की कहानी, डॉ. नारायण व्यास के घर में जिंदा है आज़ादी
15 अगस्त 1947 को उज्जैन के दौलतगंज चौराहे पर सबसे पहले तिरंगा फहराने वालों में शामिल थे डॉ. व्यास के पिता
गणतंत्र दिवस के अवसर पर जब पूरा देश आज़ादी और संविधान की भावना को नमन कर रहा है, उज्जैन में इतिहास और देशभक्ति की एक ऐसी विरासत मौजूद है, जो केवल देखने की नहीं बल्कि महसूस करने की है।
यह विरासत है उज्जैन के वरिष्ठ आर्कियोलॉजिस्ट डॉ. नारायण व्यास की, जिन्होंने देश के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े शहीदों और महापुरुषों के जन्म व बलिदान स्थलों की मिट्टी को वर्षों की मेहनत से एकत्र कर सहेज कर रखा है।
डॉ. नारायण व्यास बताते हैं कि इस अनोखे संग्रह की शुरुआत कोरोना काल के दौरान हुई। वर्ष 2022 में बीमारी के बाद जब वे आइसोलेशन में थे और उसी समय ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ प्रारम्भ हुआ था। उस दौर में कवि प्रदीप का गीत
“इस मिट्टी से तिलक करो, ये धरती है बलिदान की”
उनके मन में गूंजा।
यहीं से एक विचार जन्मा—
क्या हम अपने शहीदों के बलिदान को केवल किताबों तक सीमित रख दें, या उसे सहेज कर आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाएं?
इसी विचार के साथ डॉ. व्यास ने इस अभियान की शुरुआत इंदौर से की। अंग्रेजों के शासनकाल में इंदौर में शहीद हुए राणा बख्तावर सिंह के बलिदान स्थल से उन्होंने स्वयं जाकर सबसे पहले मिट्टी एकत्रित की। यही वह पहला पवित्र स्थल था, जहाँ से इस ऐतिहासिक संग्रह की नींव पड़ी。
इसके बाद यह यात्रा देशभर के उन स्थानों तक पहुँची, जहाँ आज़ादी के लिए बलिदान हुआ या जहाँ महापुरुषों ने जन्म लिया。
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की शहादत स्थल ग्वालियर, तांत्या टोपे का बलिदान स्थल शिवपुरी, चंद्रशेखर आज़ाद का बलिदान स्थल प्रयागराज स्थित अल्फ्रेड पार्क, नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म स्थान, लाल बहादुर शास्त्री, मदन मोहन मालवीय, और डॉ. भीमराव अंबेडकर का जन्म स्थान महू—इन सभी स्थानों की पवित्र मिट्टी आज इस संग्रह का हिस्सा है。
इतना ही नहीं, अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में शहीद हुए नरसिंहगढ़ के राजकुमार कुंवर चैन सिंह, तथा तुलसा बाई होल्कर के युद्ध स्थलों की मिट्टी भी इसमें शामिल है।
डॉ. व्यास बताते हैं कि जहां वे स्वयं नहीं जा सके, वहां उनके मित्रों और सहयोगियों ने संबंधित स्थलों से मिट्टी एकत्र कर भेजी। हर मिट्टी को विशेष डिब्बों में साफ कर रखा गया है और उस पर स्थान व शहीद का नाम अपने हाथों से लिखा गया है। उनका मानना है कि हाथ से लिखा गया इतिहास भावनाओं को जीवित रखता है।
यह संग्रह सिर्फ निजी नहीं रहा। अब तक उज्जैन, भोपाल, विदिशा, सांची विश्वविद्यालय, भीमबेटका, होशंगाबाद सहित मध्यप्रदेश और प्रदेश के बाहर कई स्थानों पर इसकी प्रदर्शनियां लगाई जा चुकी हैं।
इन प्रदर्शनियों में लोग उस मिट्टी को देखकर भावुक हो जाते हैं और कई लोग उसे अपने माथे पर तिलक के रूप में लगाते हैं। विशेष रूप से बच्चों में इसे देखने को लेकर गहरी उत्सुकता और गर्व का भाव दिखाई देता है।
डॉ. नारायण व्यास कहते हैं, अगर हम अपने शहीदों को सीधे नहीं देख सकते, तो कम से कम उनकी मिट्टी के माध्यम से उन्हें याद तो कर सकते हैं।
इस अद्भुत विरासत के पीछे उनका व्यक्तिगत इतिहास भी जुड़ा है। डॉ. व्यास के पिता स्वयं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उज्जैन के दौलतगंज चौराहे पर 15 अगस्त 1947 को सबसे पहले तिरंगा फहराने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। आज वही स्थान उनके नाम से पहचाना जाता है。
गणतंत्र दिवस के अवसर पर डॉ. नारायण व्यास की यह विरासत हमें यह संदेश देती है कि आजादी सिर्फ तारीख नहीं, बल्कि बलिदान से सनी मिट्टी की पहचान है。
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