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अबार माता मंदिर: चट्टान 70 फीट, तिल के बराबर बढ़ती आस्था
MDMahendra Dubey
Mar 21, 2026 01:01:41
Sagar, Madhya Pradesh
नवरात्रि स्पेशल... बुंदेलखंड का वो रहस्यमयी मंदिर, जहां डाकू भी झुकाते थे सिर; हर साल 'तिल' बराबर बढ़ रही है माता की चट्टान एंकर/ चैत्र नवरात्रि के पावन पर्व पर जहां पूरा देश शक्ति की भक्ति में डूबा है, वहीं मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल में एक ऐसा चमत्कारिक सिद्ध स्थान है, जो अपनी पौराणिकता और वैज्ञानिक रहस्यों के लिए दुनिया भर में कौतूहल का विषय बना हुआ है। हम बात कर रहे हैं सागर, छतरपुर और टीकमगढ़ जिले की सीमा पर स्थित 'अबार माता' मंदिर की। 70 फीट की हो चुकी है चट्टान, निसंतान दंपत्तियों की भरती है गोद अबार माता मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ मौजूद ग्रेनाइट की एक विशाल चट्टान है। स्थानीय लोगों की अटूट आस्था है कि माता इसी चट्टान में समाहित हैं। हैरत की बात यह है कि कुछ समय पहले तक यह चट्टान महज कुछ फीट की थी, लेकिन धीरे-धीरे इसका आकार बढ़ता गया और आज यह करीब 70 फीट तक पहुंच चुकी है। मान्यता है कि हर महाशिवरात्रि पर इस चट्टान की लंबाई 'एक तिल' के बराबर बढ़ जाती है। श्रद्धालु इस चमत्कार को भगवान शिव और शक्ति के मिलन से जोड़कर देखते हैं। कहा जाता है कि इस पवित्र चट्टान को छूने मात्र से निसंतान दंपत्तियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है। दस्युओं की श्रद्धा और आल्हा-ऊदल का इतिहास हजार वर्ष से भी प्राचीन यह स्थल ऐतिहासिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। एक समय यह क्षेत्र दस्युओं (डाकुओं) का गढ़ हुआ करता था। आजादी के पूर्व और बाद के दौर में अंचल के प्रसिद्ध दस्यु सरदार यहाँ गुप्त रूप से माता की सेवा और पूजन के लिए आते थे। मंदिर के नाम 'अबार' के पीछे भी एक रोचक बुंदेली कहानी है। जनश्रुति के अनुसार, महोबा के वीर योद्धा आल्हा-ऊदल जब माढोगढ़ जा रहे थे, तब इस घने जंगल में उन्हें शाम हो गई। बुंदेलखंडी भाषा में देरी होने को 'अबेर' होना कहा जाता है। आल्हा-ऊदल ने यहीं विश्राम कर अपनी आराध्य देवी का आह्वान किया, जिससे माता ने प्रकट होकर दर्शन दिए। तभी से यह स्थान 'अबार माता' के नाम से विख्यात हुआ। कालान्तर में यहाँ माता के स्वरूपों की संगमरमर की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं, लेकिन आज भी मुख्य पूजन उस अडिग ग्रेनाइट चट्टान का ही होता है। मान्यता है कि आल्हा-ऊदल को दर्शन देने के बाद माता इसी चट्टान में समाहित हो गई थीं। यही कारण है कि यहाँ प्रकृति पूजन का विशेष महत्व है और श्रद्धालु इस चट्टान को ही माता का साक्षात स्वरूप मानकर पूजते हैं। सागर जिला मुख्यालय से 85 किमी और शाहगढ़ से 15 किमी दूर स्थित है मंदिर। नवरात्रि की पंचमी और अष्टमी को माता का भव्य और विशेष श्रृंगार किया जाता है। शारदीय नवरात्रि में मेले जैसा माहौल रहता है, लेकिन चैत्र माह की नवरात्रि में यहाँ 10 दिनों का विशाल मेला लगता है, जो पूरे बुंदेलखंड में प्रसिद्ध है। सागर, टीकमगढ़ और छतरपुर से यहाँ पहुँचने के लिए बस और टैक्सी की सुगम सुविधा उपलब्ध है।
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