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रanchi के जनजातीय संवाद में भूमि, धर्मांतरण और आरक्षण पर गहन बहस
KCKumar Chandan
Jan 24, 2026 13:47:08
Ranchi, Jharkhand
रांची में जनजाति संवाद
रांची: राजधानी रांची के डीबडीह स्थित कार्यक्रम स्थल पर शनिवार को जनजातीय संवाद कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम में झारखंड सहित राज्य के विभिन्न जिलों से आए जनजातीय समाज के प्रतिनिधि, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं गणमान्य नागरिक बड़ी संख्या में शामिल हुए। कार्यक्रम का शुभारंभ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन मधुकरराव भागवत द्वारा भारत माता के चित्र पर पुष्प अर्पित कर एवं दीप प्रज्वलन के साथ किया गया।
कार्यक्रम का औपचारिक परिचय तुका उरांव द्वारा कराया गया। इसके पश्चात कैलाश द्वारा प्रस्तुत गीत “जनजातियों का धर्म नहीं है, इससे बढ़कर झूठ नहीं है” के माध्यम से कार्यक्रम की शुरुआत की गई। इस अवसर पर राज्य के 32 जनजातीय समुदायों के प्रतिनिधि एवं समाज से जुड़े हुए लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम को दो सत्रों में विभाजित किया गया।
प्रथम सत्र का संचालन मोहन कच्छप द्वारा किया गया। इस सत्र में भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले का संदेश पत्र पढ़कर सुनाया गया, जिसमें “अबुआ दिसुम, अबुआ राज” की अवधारणा पर प्रकाश डाला गया। पहले सत्र में जनजातीय समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित किया गया, जिसमें समाज के प्रबुद्धजनों ने खुलकर अपनी बात रखी।
प्रश्न सत्र के दौरान मुख्य रूप से सीएनटी/एसपीटी कानून का उल्लंघन कर जनजातीय भूमि की खरीद-फरोख्त, ईसाई एवं मुस्लिम समुदाय द्वारा किए जा रहे कथित धर्मांतरण, पेसा कानून के सही तरीके से लागू न होने, ग्रामसभा की शक्तियों को कमजोर किए जाने तथा जनजातीय महिलाओं एवं युवतियों के सामाजिक-सांस्कृतिक शोषण जैसे विषयों पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने सुझाव दिया कि धर्मांतरित जनजातियों को मिलने वाले आरक्षण पर पुनर्विचार किया जाए, जनजातीय महिलाओं के जाति प्रमाण पत्र का निर्धारण उनकी मूल पहचान के आधार पर किया जाए तथा संथाल परगना क्षेत्र में जनजातीय जमीन की सुरक्षा हेतु परंपरागत व्यवस्था को सख्ती से लागू किया जाए।
दूसरे सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने जिज्ञासा समाधान के अंतर्गत विस्तृत उद्बोधन दिया। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज और हिंदू समाज अलग नहीं हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू किसी पूजा पद्धति का नाम नहीं बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति है, जिसमें विविधताओं के बावजूद एकता का भाव निहित है। उन्होंने कहा कि हजारों वर्षों से भारत की सभ्यता जंगल, खेती और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर आगे बढ़ी है और वेदों एवं उपनिषदों का मूल भी इसी जीवन पद्धति से जुड़ा हुआ है।
मोहन भागवत ने कहा कि पृथ्वी माता सभी भाषाओं, संस्कृतियों और समुदायों का पालन करने वाली है, इसलिए विविधता का सम्मान کرنا हमारी परंपरा है। उन्होंने कहा कि धर्म का मूल अर्थ सत्य, सेवा, परोपकार और संयम है। समाज जब भोग और स्वार्थ में उलझ गया, तब आपसी मतभेद बढ़े और बाहरी आक्रांताओं ने इसका लाभ उठाया। उन्होंने कहा कि विश्व में एक ही धर्म है, मानव धर्म, और वही हिंदू धर्म का मूल स्वरूप है।
उन्होंने जनजातीय समाज को चेताते हुए कहा कि यदि समाज बंटेगा तो कमजोर होगा और यदि एकजुट रहेगा तो कोई शक्ति उसे नुकसान नहीं पहुंचा सकती। उन्होंने सरना को पूजा पद्धति बताते हुए कहा कि इसे अलग धर्म के रूप में देखना समाज को तोड़ने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि संघ का कार्य समाज को जोड़ने का है, न कि विभाजित करने का।
मोहन भागवत ने जनजातीय समाज की शिक्षा, रोजगार और सांस्कृतिक संरक्षण पर विशेष जोर देते हुए कहा कि बच्चों को प्रारंभिक आयु से ही अपनी संस्कृति, परंपरा और गौरव की शिक्षा दी जानी चाहिए। इससे वे कभी भटकेंगे नहीं और यदि भटके भी तो अपनी जड़ों की ओर वापस लौट आएंगे। उन्होंने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा जैसे महापुरुष पूरे समाज की धरोहर हैं और उनके विचारों से सभी को परिचित होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जनजातीय भूमि की रक्षा, श्रम करने वालों की प्रतिष्ठा, स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन और सामाजिक समरसता समय की आवश्यकता है। धर्मांतरण, जमीन हड़पने, सामाजिक शोषण और जनसांख्यिकीय बदलाव जैसी चुनौतियों का सामना संगठित होकर ही किया जा सकता है। उन्होंने समाज से आह्वान किया कि आत्मनिर्भर बनते हुए अपने स्वाभिमान को जागृत करें और किसी बाहरी शक्ति पर निर्भर रहने की प्रवृत्ति छोड़ें।
कार्यक्रम में राज्य भर से आए आदिवासी बहनों और भाइयों समेत कुल 36 वक्ताओं ने अपने विचार एवं सुझाव प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम में क्षेत्र संघचालक देवव्रत पाहन, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुदर्शन भगत, पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, मधु कोड़ा, चम्पई सोरेन, पद्मश्री अशोक भगत, गीता कोड़ा, संघ के क्षेत्रीय एवं प्रांतीय पदाधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता तथा बड़ी संख्या में जनजातीय समाज के लोग उपस्थित रहे।
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