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नारायणपुर की महिलाओं ने होली में हर्बल गुलाल से आत्मनिर्भरता की नई कहानी बनाई
HSHEMANT SANCHETI
Feb 20, 2026 04:02:18
Narayanpur, Chhattisgarh
नक्सल प्रभावित क्षेत्र के रूप से पहचाने जाने वाले नारायणपुर जिले से इस बार होली पर आत्मनिर्भरता और नवाचार की रंगीन कहानी सामने आई है। पालकी गांव के राधाकृष्ण स्वसहायता महिला समूह की महिलाएं प्राकृतिक संसाधनों से हर्बल गुलाल तैयार कर न केवल बाजार में पहचान बना रही हैं, बल्कि अपने जीवन में भी नए रंग भर रहे हैं। Kerrlaपाल स्थित कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा समूह की महिलाओं को घर की रसोई में उपयोग होने वाली सामग्री—हल्दी, मूली, पालक, चुकंदर, सिंदूर और गेंदा फूल के अर्क से हर्बल गुलाल बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण के बाद महिलाओं ने तुरंत उत्पादन शुरू कर दिया। आज स्थिति यह है कि इस प्राकृतिक गुलाल की मांग लगातार बढ़ रही है।
शरीर के लिए सुरक्षित, पर्यावरण के अनुकूल
समूह द्वारा तैयार किया जा रहा हर्बल गुलाल पूरी तरह प्राकृतिक तत्वों से बनाया जा रहा है। इसमें किसी भी प्रकार के रासायनिक रंगों का उपयोग नहीं किया जाता। यही वजह है कि यह त्वचा के लिए सुरक्षित है और शरीर पर किसी भी प्रकार का विपरीत असर नहीं डालता। रंगों से परहेज करने वाले लोग भी इस गुलाल के साथ निश्चिंत होकर होली का आनंद ले सकते हैं। बाजार में जहां केमिकल युक्त गुलाल स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय बने रहते हैं, वहीं इस हर्बल विकल्प ने लोगों का भरोसा जीता है।
राजधानी से मिला पांच क्विंटल का ऑर्डर
समूह की सदस्य मीना नाग बताती हैं कि प्रशिक्षण लेने के बाद से सभी महिलाएं पूरे उत्साह के साथ हर्बल गुलाल बनाने में जुट गई हैं। मांग बढ़ने के कारण महिलाएं ज्यादा से ज्यादा समय उत्पादन में दे रही हैं, ताकि ऑर्डर समय पर पूरा किया जा सके। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से ही पांच क्विंटल हर्बल गुलाल का ऑर्डर मिला है। बाजार में इस गुलाल की कीमत 300 रुपये प्रति किलो रखी गई है। उचित मूल्य और गुणवत्ता के कारण ग्राहक लगातार जुड़ रहे हैं।
प्रशिक्षण से उत्पादन तक का सफर
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. हरेंद्र कुमार ने बताया कि महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से यह पहल की गई। प्रशिक्षण के दौरान महिलाओं को प्राकृतिक रंग निकालने, सुखाने, मिश्रण और पैकेजिंग की पूरी प्रक्रिया सिखाई गई। प्रशिक्षण के बाद महिलाओं में काफी उत्साह देखा गया और उन्होंने बहुत कम समय में उत्पादन शुरू कर दिया। बढ़ती मांग इस बात का प्रमाण है कि बाजार में प्राकृतिक उत्पादों की स्वीकार्यता तेजी से बढ़ रही है।
बदलती तस्वीर, बढ़ता आत्मविश्वास
नक्सल प्रभाव से लंबे समय तक प्रभावित रहे नारायणपुर जिले में महिलाओं का यह प्रयास बदलाव की नई तस्वीर पेश कर रहा है। जिन इलाकों में कभी भय और असुरक्षा का माहौल था, वहां आज महिलाएं संगठित होकर स्वरोजगार की मिसाल कायम कर रही हैं। हर्बल गुलाल के जरिए समूह की महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त बनने की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं। इससे न केवल उनकी आय में वृद्धि हो रही है, बल्कि परिवार और समाज में उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा है। होली जैसे रंगों के त्योहार पर प्राकृतिक गुलाल की बढ़ती मांग ने यह साबित कर दिया है कि ग्रामीण महिलाएं यदि सही प्रशिक्षण और मार्गदर्शन प्राप्त करें, तो वे किसी भी क्षेत्र में सफलता हासिल कर सकती हैं।
आत्मनिर्भरता की ओर मजबूत कदम
राधाकृष्ण स्वसहायता समूह की यह पहल अन्य गांवों और महिला समूहों के लिए भी प्रेरणा बन रही है। कम संसाधनों में स्थानीय सामग्री से उत्पाद तैयार कर बाजार तक पहुंचाना आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को जमीन पर उतारने जैसा है। नारायणपुर की महिलाएं अब केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि उत्पादक और उद्यमी बनकर उभर रही हैं। हर्बल गुलाल के रंगों के साथ उन्होंने यह संदेश दिया है कि बदलाव की शुरुआत छोटे कदमों से होती है—और जब महिलाएं आगे बढ़ती हैं, तो पूरा समाज रंगीन और समृद्ध बनता है।
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