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क Kashmir में ईरान मदद के लिए एकता का विशाल मानवीय चंदा अभियान
KHKHALID HUSSAIN
Mar 24, 2026 15:35:46
Srinagar,
शिया और सुन्नी मुसलमान, साथ ही अब हिंदू और सिख भी ईरान को मदद पहुँचाने के लिए एक साथ आ गए हैं। शिया धर्मगुरुओं ने कहा, "यह मानवता की मदद है, किसी धर्म या देश की नहीं।"\n\nकश्मीर के छोटे-छोटे शिया-बहुल इलाकों से शुरू हुआ ईरान की मदद के लिए चंदा इकट्ठा करने का यह अभियान न केवल पूरे कश्मीर में फैल गया है, बल्कि अब यह एकता के अभियान में भी बदल गया है।\n\nकश्मीर और लद्दाख में युद्ध से प्रभावित ईरान के लिए हाल ही में चलाए गए चंदा अभियान को ज़बरदस्त प्रतिक्रिया मिली है, और इसमें धार्मिक व सांप्रदायिक सीमाओं से ऊपर उठकर एकता का आह्वान किया गया है। शिया और सुन्नी, दोनों समुदायों के स्थानीय लोग, साथ ही अन्य धर्मों के लोग भी अब ईरान को मदद पहुँचाने के लिए एकजुट हो गए हैं।\n\nकश्मीर में शिया समुदाय द्वारा ईरान के लिए शुरू किया गया यह प्रयास, बहुत तेज़ी से इस क्षेत्र के हाल के इतिहास में सबसे बड़े मानवीय प्रयोसों में से एक बन गया है।\n\nकश्मीर घाटी के ग्रैंड मुफ़्ती ने सार्वजनिक रूप से सुन्नी समुदाय के सदस्यों से इस अभियान में सक्रिय रूप से भाग लेने का आग्रह किया। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह नेक काम सांप्रदायिक और धार्मिक मतभेदों से ऊपर है, और समाज के हर वर्ग से इसमें योगदान देने की अपील की। उन्होंने कहा, "यह एक मानवीय ज़िम्मेदारी है, जो हम सभी की है। यह वह समय है जब हमें ईरान के लोगों के लिए जितना हो सके, उतना योगदान देना चाहिए।"\n\nबाइट\n\nएक स्थानीय शिया इमाम, सैयद ग़ाज़नफ़र ने कहा, "पिछले तीन दिनों में हमने देखा है कि भाई-बहन और बच्चे बड़ी संख्या में इन चंदा अभियानों में हिस्सा लेने के लिए आगे आ रहे हैं। आज भी, सुन्नी समुदाय के काफ़ी सदस्य योगदान देने के लिए आगे आए। क़ुरान हमें एकता सिखाता है, न कि बँटवारा। हम यहाँ से मदद करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, और हर मुसलमान को इसके लिए आगे आना चाहिए। इस मुश्किल घड़ी में लोग अपने सांप्रदायिक मतभेदों को भुलाकर एक साथ आ रहे हैं। धीरे-धीरे हम देख रहे हैं कि न केवल मुसलमान, बल्कि सभी समुदायों के लोग इस अभियान में शामिल हो रहे हैं। यह देखकर दिल को सुकून मिलता है कि हिंदू भाई भी इस चंदा अभियान में हिस्सा लेने के लिए आगे आए हैं। इस्लाम हमें यह सिखाता है कि जिस किसी पर भी ज़ुल्म हो रहा हो—चाहे वह हिंदू हो, मुसलमान हो या सिख—हमें उसकी मदद ज़रूर करनी चाहिए। हम इसी सिद्धांत का पालन कर रहे हैं।"\n\nबाइट\n\n"पिछले कुछ दिनों से, घाटी के हर ज़िले में शिया-बहुल इलाकों में डोनेशन कैंप लगाए गए हैं, जहाँ अब भारी संख्या में लोग उमड़ रहे हैं। हर तबके के लोग अपनी-अपनी तरह से योगदान देने के लिए आगे आए हैं। महिलाओं को अपने निजी गहने, जिनमें सोने और चाँदी के आभूषण शामिल हैं, दान करते देखा गया है, जबकि कुछ लोग ताँबे के बर्तन लेकर आए हैं। यहाँ तक कि लोगों ने अपने वाहन और पालतू जानवर भी दान कर दिए हैं। डोनेशन सेंटरों से कुछ बेहद दिल को छू लेने वाले दृश्य सामने आए हैं, जहाँ सैकड़ों बच्चे अपनी गुल्लकें लेकर पहुँचे और ईरानी लोगों की मदद के लिए खुशी-खुशी अपनी जमा-पूँजी दान कर दी।\n\nबाइट\n\nमोहम्मद शफ़ी, एक स्थानीय निवासी ने कहा, "मैं यहाँ काफी समय से हूँ और उन लोगों को देख रहा हूँ जो दान करने आए हैं। अभी कुछ देर पहले ही, सुन्नी समुदाय की चार-पाँच महिलाओं ने अपने गहने और नकद पैसे दान किए। हम ईरान के लोगों के साथ पूरी एकजुटता से खड़े हैं। जहाँ कोई भी पड़ोसी देश मदद के लिए आगे नहीं आ रहा है, वहीं हम दुनिया को यह दिखाना चाहते हैं कि हम उन लोगों का समर्थन करते हैं जो इस ज़ुल्म का विरोध कर रहे हैं।"\n\nआयोजकों का अनुमान है कि पूरे कश्मीर घाटी में अब तक लगभग ₹500 से ₹600 करोड़ (भारतीय रुपये) जमा हो चुके हैं। उम्मीद है कि आने वाले दिनों में यह आँकड़ा और बढ़ेगा, क्योंकि यह अभियान लगातार ज़ोर पकड़ रहा है। प्रशासन ने इन फंडों के संग्रह की निगरानी करने और उसमें पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए नियम भी जारी किए हैं।\n\nयह पहल कश्मीर की एकता और उदारता की अटूट भावना का एक सशक्त प्रमाण है। यह दिखाता है कि वैश्विक संकट के समय मानवीय उद्देश्य किस तरह अलग-अलग समुदायों और धर्मों के लोगों को एक साथ ला सकते हैं।\n\nईरानी दूतावास ने भी कश्मीर के लोगों के प्रति गहरा आभार व्यक्त किया और इन मानवीय प्रयासों को "आशा की किरण" बताया।
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