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ईरान–इजराइल युद्ध से पंजाब की मंडी गोबिंदगढ़ की लोहा उद्योग संकट में
DSDharmindr Singh
Mar 11, 2026 11:34:22
Fatehgarh Sahib, Punjab
ईरान–इजराइल युद्ध की आंच भारत की ‘लोहा नगरी’ तक
गैस सप्लाई में 70 फीसदी कटौती से मंडी गोबिंदगढ़ की इंडस्ट्री संकट में
NGT के सख्त नियम, गैस की कमी और बढ़ती कीमतों के बीच 150 से अधिक औद्योगिक इकाइयों पर बंदी का खतरा
उद्योग जगत ने केंद्र व पंजाब सरकार से वैकल्पिक ईंधन की मांग की
मध्य-पूर्व में चल रहे ईरान–इजराइल युद्ध का असर अब भारत के औद्योगिक क्षेत्रों तक दिखाई देने लगा है। एशिया की सबसे बड़ी लोहानगरी मानी जाने वाली पंजाब की मंडी गोबिंदगढ़ की स्टील व लोहा इंडस्ट्री पर इसका सीधा असर पड़ा है। गैस कंपनियों ने यहां औद्योगिक इकाइयों को मिलने वाली पीएनजी (पाइप्ड नेचुरल गैस) की सप्लाई में भारी कटौती कर दी है। उद्योगपतियों का कहना है कि मौजूदा हालात में गैस की आपूर्ति जरूरत के मुकाबले करीब 50 से 70 प्रतिशत तक कम हो गई है, जिससे उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
हफ्ते में दो-तीन दिन ही चल पाएगी इंडस्ट्री
ऑल इंडिया स्टील री-रोलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष विनोद वशिष्ट के अनुसार गैस कंपनियों ने न सिर्फ सप्लाई कम की है बल्कि कीमतों में भी बढ़ोतरी कर दी है। प्रति स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर (SCM) गैस के दाम लगभग 6 रुपये बढ़ा दिए गए हैं। उनका कहना है कि पहले उद्योगों को जरूरत से भी 20 फीसदी ज्यादा गैस मिल जाती थी, लेकिन अब जरूरत से करीब आधी सप्लाई ही दी जा रही है। ऐसे हालात में कई इकाइयों को हफ्ते में सिर्फ दो दिन ही उत्पादन चलाने की स्थिति बन रही है। अगर स्थिति और बिगड़ी तो उद्योग पूरी तरह बंद रह सकते हैं।
NGT के निर्देश और ईंधन की मजबूरी
स्थिति को और जटिल बनाते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने इंडस्ट्री को पीएनजी पर चलाने के निर्देश दे रखे हैं। पर्यावरण मानकों को ध्यान में रखते हुए कोयले के इस्तेमाल पर सख्ती बरती जा रही है। उद्योगपतियों का कहना है कि जब किसी यूनिट को पीएनजी पर चलाने के लिए नई भट्ठी लगाई जाती है तो उस पर करीब डेढ़ से दो करोड़ रुपये का खर्च आता है। लेकिन यदि उसी भट्ठी में कोयले का इस्तेमाल कर लिया जाए तो वह पूरी तरह खराब हो जाती है और फिर से नई भट्ठी लगानी पड़ती है। ऐसे में उद्योग के लिए बार-बार इतना निवेश करना संभव नहीं है।
वैकल्पिक ईंधन की मांग
विनोद वशिष्ट के अनुसार उद्योग जगत ने केंद्र और पंजाब सरकार को पत्र लिखकर मांग की है कि जब तक गैस की सप्लाई स्थिर और सस्ती नहीं हो जाती, तब तक कम से कम एक वर्ष के लिए कोयले या अन्य वैकल्पिक ईंधन के इस्तेमाल की अनुमति दी जाए। उनका कहना है कि कुछ ऐसे ईंधन विकल्प मौजूद हैं जिन पर इंडस्ट्री चलाने में कम खर्च आता है और उनसे प्रदूषण भी नियंत्रित रहता है। मंडी गोबिंदगढ़ में ऐसे मॉडल पहले से प्रयोग में हैं और उनसे उद्योग सुचारु रूप से चल सकते हैं।
150 से ज्यादा इकाइयों पर संकट
मंडी गोबिंदगढ़ में करीब डेढ़ सौ से अधिक स्टील और रोलिंग मिलें काम कर रही हैं। इन उद्योगों पर हजारों मजदूरों की रोजी-रोटी निर्भर है। उद्योगपतियों का कहना है कि अगर गैस की कमी और महंगी दरें जारी रहीं तो बड़ी संख्या में इकाइयों को उत्पादन बंद करना पड़ सकता है。
गैस कंपनियों ने नए कनेक्शन देने से भी इंकार कर दिया है, जिससे नई इकाइयों के लिए स्थिति और मुश्किल हो गई है।
प्रदूषण मानकों पर भी उद्योग का पक्ष
विनोद वशिष्ट का कहना है कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय 250 एसपीएम (सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर) तक के कोयले के इस्तेमाल की अनुमति देता है, जबकि मंडी गोबिंदगढ़ के उद्योगों के लिए 150 एसपीएम का कड़ा मानदंड लागू किया गया है। इसके बावजूद वे बेहतर गुणवत्ता का कोयला इस्तेमाल कर प्रदूषण कम रखने की कोशिश कर रहे हैं। उनका दावा है कि आने वाले समय में इसे 50 एसपीएम तक लाने की योजना भी है, जिससे प्रदूषण का स्तर बिल्कुल न के बराबर होगा।
अलग-अलग राज्यों में अलग नीति से बढ़ी चिंता
विनोद वशिष्ट ने कहा कि उद्योग जगत का एक बड़ा मुद्दा यह भी है कि पूरे देश में एक समान नीति लागू नहीं है। विनोद वशिष्ट के अनुसार पंजाब के सभी जिलों में पीएनजी को अनिवार्य नहीं किया गया है, लेकिन मंडी गोबिंदगढ़ और खन्ना के उद्योगों पर ही ज्यादा दबाव बनाया जा रहा है। इससे प्रतिस्पर्धा में असंतुलन पैदा हो रहा है। जिन राज्यों में कोयले या अन्य ईंधन की अनुमति है वहां की इकाइयों की लागत कम होगी और मंडी गोबिंदगढ़ के उद्योगों का माल महंगा पड़ेगा, जिससे उनकी मांग घट जाएगी।
सरकार से त्वरित हस्तक्षेप की मांग
उद्योग संगठनों ने केंद्र और पंजाब सरकार से तुरंत हस्तक्षेप कर समाधान निकालने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि जल्द कोई नीति नहीं बनी तो एशिया की सबसे बड़ी लोहानगरी कही जाने वाली मंडी गोबिंदगढ़ की औद्योगिक गतिविधियां ठप पड़ सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितता और पर्यावरणीय नियमों के बीच संतुलन बनाना सरकारों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। यदि समय रहते समाधान नहीं निकला तो इसका असर न केवल स्थानीय उद्योग बल्कि पूरे स्टील सप्लाई चेन और रोजगार पर भी पड़ सकता है।
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