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तालिबान के महिला कानून पर मौलाना इसहाक़ गोरा का कड़ा विरोध
NJNEENA JAIN
Feb 22, 2026 06:19:44
Saharanpur, Uttar Pradesh
जमीयत दावातुल मुस्लिमीन के संरक्षक और मशहूर देवबंदी उलेमा मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा ने एक वीडियो बयान जारी कर तालिबान द्वारा महिलाओं से संबंधित कथित क़ानून की कड़ी निंदा की है. इस क़ानून के हवाले से यह दावा किया गया कि पति को पत्नी की “गलती” पर शारीरिक दंड देने की अनुमति है, बशर्ते हड्डी न टूटे. मौलाना गोरा ने इसे न केवल अमानवीय बताया, बल्कि साफ़ शब्दों में कहा कि ऐसी सोच को मज़हब-ए-इस्लाम से जोड़ना सरासर ग़लत है.
उन्होंने अपने बयान में कहा कि इस्लाम रहमत, इंसाफ़ और इज़्ज़त का दीन है. किसी भी प्रकार की ज़्यादती, अपमान या हिंसा को शरीअत की तालीमात का हिस्सा बताना दीन की ग़लत तशरीह है. मौलाना ने ज़ोर देकर कहा कि घरेलू जीवन में नर्मी, मुहब्बत और रहम का उसूल बुनियादी है. अगर किसी समाज या गिरोह की सोच इस बुनियाद से टकराती है, तो उसे इस्लामी करार नहीं दिया जा सकता.
मौलाना गोरा ने याद दिलाया कि इस्लाम में ख़वातीन का मर्तबा बुलंद है. उन्होंने हदीस-ए-नबवी का हवाला देते हुए कहा कि पैग़म्बर मोहम्मद साहब ने औरतों के साथ हुस्ने-सुलूक की ताकीद फ़रमाई और उन्हें अल्लाह की अमानत बताया. निकाह को रहमत और सुकून का रिश्ता कहा गया है, न कि ताक़त और ज़बरदस्ती का मैदान. उन्होंने कहा कि जो लोग औरत पर हाथ उठाने को दीन का हिस्सा बताने की कोशिश करते हैं, वे इस्लाम की अस्ल रूह से नावाक़िफ़ हैं.
अपने बयान में उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोग इस्लाम का नाम लेकर सख़्ती और तशद्दुद को जायज़ ठहराने की कोशिश करते हैं, जबकि इस्लाम की बुनियादी तालीमात इंसाफ़, सब्र और रहम पर क़ायम हैं. अगर कोई समूह बार-बार दीन का हवाला देता है, मगर उसके अमल इस्लामी उसूलों से मेल नहीं खाते, तो मुसलमानों को चाहिए कि वे होशियारी से फ़र्क़ करें और दीन को ऐसे रवैयों से अलग रखें.
मौलाना ने कहा कि यह अफ़सोस की बात है कि दुनिया के सामने इस्लाम की तस्वीर कुछ लोगों के अमल की वजह से धुंधली की जाती है. उन्होंने उलेमा और ज़िम्मेदार लोगों से अपील की कि वे खुलकर ऐसी सोच की मुख़ालफ़त करें और समाज को बताएं कि इस्लाम औरत की इज़्ज़त, हक़ और हिफ़ाज़त की तालीम देता है.
अंत में मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा ने कहा कि दीन की सही समझ और सही तालीम ही समाज को इंतिशार से बचा सकती है. इस्लाम को सियासी या गिरोहबंदी के फ़ैसलों से नहीं, बल्कि क़ुरआन व सुन्नत की रोशनी में समझा जाना चाहिए. उन्होंने दुआ की कि अल्लाह तआला उम्मत को हिकमत, इंसाफ़ और रहमत के रास्ते पर क़ायम रखे.
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