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ओयल के मेढ़क मंदिर: रहस्यों से भरा तंत्र-शिवालय पर्यटन आकर्षण
DMDILEEP MISHRA
Feb 02, 2026 10:38:09
Baibahamunnusingh, Uttar Pradesh
लखीमपुर खीरी मुख्यालय से 12 किलोमीटर की दूरी, सीतापुर मार्ग पर ओयल में स्थित विश्व विख्यात मंदिर शिव मंदिर जिसे मेंढ़क मंदिर के नाम से जाना जाता है। अपने रहस्यों के लिए जाना जाता है। इस मंदिर का निर्माण 1860-70 के दशक में राजा बखत सिंह ने बनवाया था। मेंढ़क मंदिर में शिव का लिंग नर्मदा नदी से प्राप्त कर स्थापित किया गया था। यह मंदिर अपने आप में महत्वपूर्ण इसलिए भी है कि इस मंदिर में स्थापित शिव लिंग दिन में तीन बार अपना रंग बदलता है। इस मंदिर की विशेषता है कि मगरमच्छ के ऊपर मेंढ़क, मेंढ़क के ऊपर कमल, कमल के ऊपर शिव लिंग स्थापित है। ऊपर स्थापित कुआँ जो कि झील से जोड़ा गया था, ताकि पानी कभी समाप्त न हो और वहीं से जल लेकर भोले शंकर की पूजा करने की मान्यता है। मंदिर के ऊपर नटराज की मूर्ति के साथ सूर्य चक्र लगा हुआ है। लोगों का मानना है कि यह सूर्य चक्र सूर्य के साथ-साथ घूमता रहता है। इसी कारण इसे मेंढ़क मंदिर भी कहते हैं। लोगों का मानना है कि इस पौराणिक मंदिर में दर्शन मात्र से ही सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। शिव भगवान अपने भक्तों को संकटों से बचाते हैं। वी ओ: तंत्र-मंत्र पर आधारित इस मंदिर को देश के कोने-कोने से लोग देखने आते हैं साथ ही अपने आराध्य शिव के दर्शन कर पुण्य अर्जित करते हैं। मंदिर के चारों ओर सीढ़ियाँ बनायी गयी हैं और मंदिर की रक्षा हेतु चार स्तम्भों का निर्माण भी इस मंदिर की प्रमुख विशेषता है। हर स्तम्भ के ऊपर तक जाने के लिए टेढ़ी-मेढ़ी सीढ़ि़यों का निर्माण भी देखने को मिलता है। इस स्तम्भ पर रहकर लोग इसकी सुरक्षा भी करते हैं। तांत्रिक क्रियाओं पर आधारित इस मंदिर की दीवारों पर की गयी नक्काशी और देवताओं की शिल्पकला बहुत बेजोड़ है, जिसमें प्रमुख द्वार पर गणेश जी की मूर्ति स्थापित है और यह मंदिर चारों ओर से शिल्पकला का यथार्थ रूप है। लगभग 100 फिट ऊँचाई वाले इस मंदिर की इमारत को चारों ओर दीवारों से घिरा है। मुख्य द्वार अभी हाल ही में सुरक्षा की दृष्टि से बंद कर दिया गया और प्रवेश के लिए एक सीढ़ी नुमा द्वार बनाया गया। जिसमें प्रवेश कर श्रद्धालु मंदिर के प्रांगण में पहुँचते हैं। मंदिर के चारों ओर खूबसूरत फूलों से सजा बगीचा भी है, जो मंदिर की खूबसूरती को चार चांद लगा रहा है। सावन में हजारों श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। सोमवार को प्रतिदिन काफी लोग शिव जी के दर्शन करने आते हैं। विश्व विख्यात यह मंदिर अनोखा मंदिर है, क्योंकि कालेश्वर भगवान के मंदिर में खड़ी कामधेनु के बाद इसी मंदिर में खड़ी कामधेनु देखने को मिलती हैं। राजाओं द्वारा निर्मित इस मंदिर की प्रतिष्ठा उनके वंशज आज भी कायम रखें हैं और उनके वंशज इसे आज भी आगे बढ़ाते चले आ रहे हैं, लेकिन उनके वंशजों का यह भी मानना है कि इस मंदिर की विशेषता होने के कारण पुरातत्व विभाग इसे टूरिज्म क्षेत्र के लिए तैयारी कर रहा है और इसके रहस्य पर भी शोध कर रहा है, क्योंकि इसमें बहुत रहस्य छुपे हैं ऐसा टीम का मानना है। मंदिर का जीर्णोद्धार कराने के लिए यह लोग लगे हैं। इतिहासिक महत्व: शिव भक्तों व साधकों के आकर्षण का केंद्र है मेढ़क मंदिर,gosai sena से जीते गए धन से राजा बख्त सिंह ने कराया था मंदिर निर्माण, gosai ब्राह्मणों के धन को कोषागार में न रखने की थी मान्यता, मांड्यूक तंत्र पर आधारित है मंदिर। लखीमपुर-खीरी। सावन का महीना शिव भक्तों के लिए खास महत्व रखता है। इन दिनों पौराणिक व सिद्ध शिव स्थलों पर भक्तों की काफी भीड़ उमड़ती है। इन्हीं में से एक है ओयल का मेढ़क मंदिर। इसका निर्माण तत्कालीन राजा बख्त सिंह ने देव इच्छा से किया था। यहां शिव भक्तों के साथ मंदिर के मांड्यूक तंत्र पर आधारित होने की वजह से यहाँ सिद्धि करने वाले योगियों का जमावड़ा भी लगता है। ओयल के बड़ा शिवालय के नाम से प्रसिद्ध मेढ़क मंदिर का निर्माण राजा बख्त सिंह ने करवाया था। राजा बख्त सिंह ओयल नरेश युवराजदत्त सिंह के पूर्वज थे। बताते हैं कि बख्त सिंह के समय ओयल क्षेत्र में गोसाई लोग प्रबल थे। यह लोग भाड़े पर युद्ध लड़ते थे और जीतने पर सहयोग लेने वाले राजा से इन्हें मिलने वाले राज्य व लूटने वाले धन का बड़ा हिस्सा मिलता था। जब गोसाई सेना का युद्ध राजा बख्त सिंह से हुआ तो गोसाई सेना बुरी तरह पराजित हुई। राजा साहब ने गोसाई सेना का दमन कर उनकी अपार धन-सम्पदा को अपने नियंत्रण में ले लिया। चूंकि उस समय गोसाई ब्राह्मणों के धन को भगवान चंद्रमौलि शंकर माने जाने की मान्यता थी इसलिए राजा ने ब्राह्मणों व पंडितों से धर्म चर्चा कर इस धन को अपने राजकोष में नहीं रखवाया। बताते हैं कि उसी रात राजा को स्वप्न में अर्जित धन से विशाल मंदिर बनवाने की प्रेरणा प्राप्त हुई। फिर क्या था, काशी, उज्जैन, बंगाल तथा सुदूर क्षेत्रों से पंडितों का जमावड़ा ओयल में एकत्र होने लगा। काशी के पंडितों द्वारा परम दुर्लभ मांड्यूक तंत्र पर मंदिर निर्माण का श्रीगणेश किया गया। मंदिर का गर्भग्रह एक विशाल मेढ़क की पीठ पर स्थित है जो उत्तरामुखी है। मंदिर के गर्भगृह के सबसे निचले तल पर आठ कमल दल हैं जिन पर मुख्य गर्भ ग्रह स्थित है। मंदिर का शिवलिंग नर्मदा नदी के पूज्य पाहन से बना है इसलिए इस मंदिर का एक नाम नर्मदेश्वर मंदिर भी है। कहा जाता है कि जब मंदिर बन गया तब शंकर जी का विशाल शिवलिंग ऊपर चढ़ाने के लिए मिट्टी का एक ढालू पटान किया गया और एक छकड़े पर उस शिवलिंग को लादकर ऊपर चढ़ाया जाने लगा। अचानक रस्सी का छकड़ा टूट जाने से शिवलिंग पीछे सरकने लगा। यह देख सभी के पसीने आ गए। लेकिन धर्म-परायण राजा ने शिव का ध्यान करते हुए शिवलिंग को अपनी बलिष्ठ भुजाओं से दबोच लिया। राजा के दोनों पैर मिट्टी में धंस गए लेकिन उन्होंने शिव लिंग को पीछे सरकने नहीं दिया। इसके बाद शिवलिंग को मंदिर में स्थापित किया गया। यहां खड़ी अवस्था में है नंदी की प्रतिमा। मेढ़क मंदिर की एक खासियत और भी है: यहाँ स्थापित शिव जी के वाहन नंदी की प्रतिमा खड़ी स्थिति में है, जबकि आम तौर पर शिव मंदिरों में नंदी की प्रतिमा बैठी अवस्था में होती है। देखरेख के अभाव में जर्जर होता जा रहा मंदिर। आध्यात्मिक मान्यता रखने वाला मेढ़क मंदिर देखरेख के अभाव में जर्जर होता जा रहा है। मंदिर के ऊपर से स्वर्ण चाँद होता था। इसकी खासियत है कि यह चाँद सूर्य उदय होने से अस्त होने के साथ तक सूर्य की दिशा में ही घूमता है। कुछ सालों पहले इस चाँद को कुछ चोर आधा काट ले गए थे तब से यह अर्ध चंद्र के रूप में है। लोगों ने इस पौराणिक मंदिर को बचाए रखने के लिए इसका जीर्णोद्धार कराने की मांग की है। श्रद्धालुओं के साथ मंदिर परिसर से जुड़ी जानकारी दे रहे बाइट्स भी शामिल हैं।
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