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राजस्थान हाईकोर्ट: स्थानांतरण आदेश रद्द, अनुशासनात्मक कार्रवाई विभागीय अधिकारी के अधीन
RKRakesh Kumar Bhardwaj
Nov 14, 2025 17:57:28
Jodhpur, Rajasthan
जोधपुर-- राजस्थान हाईकोर्ट जस्टिस फरजंद अली की बेंच ने एक महत्त्वपूर्ण आदेश देते कहा कि केंद्रीय कारागार के अधीक्षक के पास मेडिकल एवं स्वास्थ्य विभाग से प्रतिनियुक्ति पर आए किसी चिकित्सा अधिकारी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने का न तो अधिकार है और न ही क्षमता। हाईकोर्ट ने न केवल स्थानांतरण आदेशों को रद्द किया, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित अधिकारी के विरुद्ध कोई भी अनुशासनात्मक कार्रवाई केवल सक्षम प्राधिकारी यानी मेडिकल एवं स्वास्थ्य विभाग द्वारा ही की जा सकती है। याचिकाकर्ता कैलाश सांखला ने अधिवक्ता मुक्तेश माहेश्वरी के जरिए याचिका पेश करते हुए अपने स्थानांतरण आदेशों को चुनौती दी थी। याचिका में बताया गया कि याचिकाकर्ता जो मूल रूप से मेडिकल एवं स्वास्थ्य सेवा विभाग के अंतर्गत एक चिकित्सा अधिकारी थे। उन्हें कैदियों की चिकित्सा देखभाल के लिए प्रतिनियुक्ति पर बीकानेर स्थित केंद्रीय कारागार में तैनात किया गया था। एक कथित शिकायत के आधार पर उप सचिव, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग ने याचिकाकर्ता को केंद्रीय कारागार से स्थानांतरित कर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भेजने का आदेश जारी किया। साथ ही केंद्रीय कारागार के अधीक्षक को याचिकाकर्ता के विरुद्ध अनुशासनात्मक जांच प्रारंभ करने का निर्देश भी दिया गया। याचिका में 31 अगस्त 2018 और 4 सितंबर 2018 के स्थानांतरण आदेशों को चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद पाया कि याचिकाकर्ता प्रशासनिक रूप से पूरी तरह मेडिकल एवं स्वास्थ्य विभाग के नियंत्रण में कार्यरत थे। ऐसे में किसी अलग विभाग जैसे कि जेल प्रशासन के अधिकारी द्वारा उनके विरुद्ध कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करना नियमों के प्रतिकूल है। हाईकोर्ट ने कहा कि राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1958 के अनुसार आरोप-पत्र जारी करने सहित किसी भी अनुशासनात्मक कार्रवाई की पहल केवल मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी या विभाग के निदेशक जैसे सक्षम प्राधिकारियों द्वारा ही की जा सकती है। हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि स्थानांतरण आदेश के समर्थन में ऐसा कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया गया, जिससे यह सिद्ध हो कि यह निर्णय किसी प्रशासनिक आवश्यकता, कार्य-प्रदर्शन संबंधी पहलू या किसी वैध आधार पर लिया गया था। हाईकोर्ट ने इसे प्रक्रियागत अनुचितता, अधिकार क्षेत्र के अभाव तथा प्रशासनिक विवेकाधिकार के मनमाने उपयोग का उदाहरण बताया। हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी भी की कि जिस प्राधिकारी ने स्थानांतरण आदेश जारी किया और अनुशासनात्मक कार्रवाई का निर्देश दिया, उसके पास सेवा नियमों के अंतर्गत आवश्यक योग्यता नहीं थी, जिससे पूरा आदेश अधिकार-क्षेत्रहीन हो गया। हाईकोर्ट ने कहा राजस्थान सिविल सेवा नियम तथा सीसीए नियम, 1958 में निहित प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया। प्रतिवादी यह सिद्ध करने में असमर्थ रहे कि की गई कार्रवाई किसी विधिक प्रावधान या स्थापित प्रशासनिक मानदंडों के अनुरूप थी। हाईकोर्ट ने 31 अगस्त 2018 और 4 सितंबर 2018 के स्थानांतरण आदेशों को रद्द करने का निर्देश दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि यदि आवश्यक हो तो मेडिकल एवं स्वास्थ्य विभाग का सक्षम प्राधिकारी नियमों के अनुरूप याचिकाकर्ता के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू कर सकता है। तब तक याचिकाकर्ता बीकानेर केंद्रीय कारागार में अपने पद पर बने रहने के अधिकारी होंगे।
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