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सारंडा में पोस्टर वार से नक्सल विरोधी अभियान तेज, स्वेच्छा से सरेंडर के संकेत
APAnand Priyadarshi
Mar 27, 2026 10:34:29
Chaibasa, Jharkhand
झारखण्ड से नक्सलवाद खत्म करने के लिए सारंडा में पुलिस का पोस्टर वार, नक्सलियों से आत्मसमर्पण की अपील
एसपी ने कहा - नक्सलियों को या तो अब सरेंडर करना होगा, या फिर उन्हें पुलिस की गोली का शिकार होना पड़ेगा
पोस्टर में नक्सलियों की तस्वीर, घोषित इनाम, पुलिस के नंबर और आत्मसमर्पण की अपील
झारखंड के नक्सक प्रभावित सारंडा के घने जंगलों में अब सिर्फ गोलियों की गूंज ही नहीं, बल्कि पोस्टरों की ‘मार’ भी नक्सलियों की नींद उड़ा रही है। सुरक्षा बलों ने इस बार बंदूक के साथ दिमागी रणनीति अपनाई है। सारंडा जंगल के रास्तों, गांवों के चौक-चौराहों और सरकारी इमारतों पर पोस्टरों की बाढ़ ला दी गई है। इन पोस्टरों में नक्सलियों की तस्वीरें, उनके सिर पर घोषित इनाम, पुलिस अधिकारियों के नंबर और आत्मसमर्पण की खुली अपील दर्ज है। यही नहीं नक्सलियों के काले कारनामों को उजागर कर ग्रामीणों के सामने भी पुलिस द्वारा रखा जा रहा है, ताकि ग्रामीण नक्सलियों के क्रूर हिंसक मानसिकता को समझ सकें।
यह अभियान ऐसे वक्त तेज हुआ है जब केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद खत्म करने का लक्ष्य तय कर रखा है। झारखंड इस लक्ष्य के करीब है, लेकिन सारंडा अब भी नक्सलियों का आखिरी ठिकाना बना हुआ है। बीते तीन वर्षों से यहां नक्सली हिंसा और उसके खिलाफ सुरक्षाबलों का अभियान तेजी से चल रहा है, लेकिन अब शुरू हुए पोस्टर अभियान ने नक्सलियों पर मनोवैज्ञानिक दबाव कई गुना बढ़ा दिया है।
पश्चिम सिंहभूम के एसपी अमित रेनू ने साफ़ तौर पर कह दिया है कि नक्सलियों के पास यह अब आखिरी मौका है. या तो वे आकर स्वेच्छा से एटीएम समर्पण कर झारखण्ड सरकार के आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति का लाभ उठायें या फिर पुलिस की गोलियों से ढेर होने के लिए तैयार रहें. क्योंकि अब सारंडा के घने जंगलों में सुरक्षाबलों ने निर्णायक लड़ाई को लेकर बड़ा अभियान छेड़ दिया है. पुलिस की कोशिश है कि नक्सलियों को पोस्टर के जरिये आखिरी मौका दिया जाए.
एसपी ने बताया की सारंडा में अब मात्र 50 से भी कम नक्सली बच गए हैं. जिसका अंत नजदीक है. अगर नक्सली अपनी जान की खैर चाहते हैं तो उन्हें सरेंडर पालिसी का लाभ उठाना चाहिए और समाज की मुख्य धारा में शामिल होकर शांति और खुशहाल जिंदगी की नयी शुरुआत कर सकते हैं. एसपी ने कहा है कि नक्सली किसी भी क्षेत्र का हो या राज्य का वे आकर चाईबासा पुलिस के सामने भी आत्मसमर्पण कर सकते हैं, उन्हें भी वही सारी सुविधा सरेंडर पालिसी के तहत दी जाएगी जैसा अन्य नक्सलियों को दी जाएगी.
बता दें कि 22 जनवरी 2026 को सुरक्षाबलों ने ‘ऑपरेशन मेगाबुरु’ के तहत बड़ा प्रहार किया था। किरीबुरु थाना क्षेत्र के कुम्डी इलाके में करीब सात घंटे चली मुठभेड़ में 17 नक्सली ढेर कर दिए गए थे। इस अभियान की बड़ी उपलब्धि सुरक्षाबलों के लिए यह रही थी कि इस एनकाउंटर में एक करोड़ के इनामी अनल उर्फ पतिराम मांझी (तूफान दा) और 25 लाख के इनामी अनमोल जैसे बड़े नक्सली नेता ढेर कर दिए गए थे। भारी मात्रा में हथियार और गोला बारूद भी बरामद हुआ था। इस झटके के बाद नक्सली अब छोटे-छोटे समूहों में छिपकर गतिविधियां चला रहे हैं।
कोल्हान-सारंडा इलाके में अब सिर्फ दो बड़े इनामी नक्सली, मिसिर बेसरा और असीम मंडल बचे हैं, जिन पर एक एक करोड़ का इनाम है। इनके अलावा करीब 50 से अधिक नक्सली अब भी सारंडा जंगल में सक्रिय बताए जा रहे हैं, लेकिन 15 हजार से ज्यादा जवानों की घेराबंदी ने उनके लिए बचकर भाग निकलने के सारे रास्ते लगभग बंद कर दिए हैं।
पुलिस द्वारा चलाये जा रहे पोस्टर अभियान को तीन हिस्सों में बांटा गया है। जिसके तहत तीन तरह के पोस्टर लगाये जा रहे हैं, इनमें इनामी पोस्टर, आत्मसमर्पण अपील वाली पोस्टर और तीसरा पोस्टर वह है जिसमें नक्सलियों के तस्वीर के साथ उनके हिंसक अत्याचारों का खुलासा किया गया है। खास बात यह है कि ये पोस्टर स्थानीय भाषाओं जैसे हो, मुंडारी और संथाली में तैयार किए गए हैं, ताकि सीधे प्रभावित ग्रामीणों तक पुलिस का संदेश पहुंच सके। गांव गांव में पर्चे बांटकर नक्सलियों के दोहरे चेहरे को उजागर किया जा रहा है।
इसी के साथ आत्मसमर्पण नीति को भी ज्यादा आकर्षक बनाया गया है। अब सरेंडर करने वाले नक्सलियों को हाराजिरीबाग की ओपन जेल में परिवार के साथ रहने और कौशल प्रशिक्षण का मौका मिलेगा। उन्हें सिलाई, बागवानी और हस्तशिल्प जैसे काम सिखाए जाएंगे, ताकि वे सम्मानजनक जीवन जी सकें। इतना ही नहीं, उनके सिर पर घोषित इनाम की राशि भी उन्हें ही दे दी जाएगी, ताकि आर्थिक तंगी से उनके जीवन की नयी शुरुआत में कोई दिक्कत ना आये।
इस बदली रणनीति का असर भी साफ दिख रहा है। पहले जहां ग्रामीण नक्सलियों के दबाव में रहते थे, अब वही लोग पुलिस को सूचना दे रहे हैं। नक्सलियों द्वारा बिछाए गए आईईडी विस्फोटों से हुई मौतों और नुकसान के बाद आदिवासी समुदाय का भरोसा नक्सलियों से उठता जा रहा है। बदले में पुलिस भी गांवों तक स्वास्थ्य सुविधा और विकास योजनाएं पहुंचा रही है। ग्रामीणों के लिए नक्सली अब काल बन गए हैं जबकि इसके उलट पुलिस उनकी हमदर्द के रूप में सामने आई है। और इसी का फायदा पुलिस को मिल रहा है।
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि अगर सारंडा से नक्सलियों का सफाया हो गया, तो झारखंड से नक्सलवाद लगभग खत्म हो जाएगा। अब मुठभेड़, पोस्टर अभियान, आत्मसमर्पण नीति और ग्रामीण सहयोग, इन चारों के संयुक्त प्रहार ने नक्सलियों को आखिरी मोड़ पर ला खड़ा किया है।
झारखण्ड पुलिस का नक्सलवाद को लेकर साफ़ संदेश है कि अब या तो हथियार डालकर मुख्यधारा में लौट आओ, या फिर कार्रवाई का सामना करो। 31 मार्च की डेडलाइन करीब है और सारंडा की जंग निर्णायक दौर में पहुंच चुकी है। अब यह देखना होगा कि इस पोस्टर वार के जवाब में नक्सली आगे क्या कदम उठाते हैं。
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