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नीलगाय की जगह घोड़परास और नील बकरी: बिहार विधानसभा में नया नामकरण
PJPrashant Jha2
Feb 03, 2026 13:18:26
Patna, Bihar
बिहार में अब नीलगाय को घोड़परास का नाम दिया गया है. आज बिहार विधानसभा में डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा ने ऐलान किया कि नील गाय की जगह घोड़परास या नील बकरी कहा जाना चाहिए .
दरअसल , आज विधान सभा में सकरा विधान सभा के विधायक आदित्य कुमार ने सवाल उठाया की नील गाय की वजह से किसानो के फसलों का नुकसान काफी हो रहा है और सरकार इन नील गाय को शूट नहीं कर रही है . इस कारण फसल को रौंदने वाले की संख्या बढ़ रही है और किसान लगातार फसलों की नुकसान से परेशान हो रहे हैं . जबकि सरकार ने इनको शूट करने का प्लान बनाया था जो कारगर नहीं हो रहा है . विधायक आदित्य कुमार के सवाल पर विपक्ष और सत्ता पक्ष के कई विधायक खड़े हो गए और सरकार को घेरने लगे . इस दौरान बिहार के डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा ने कहा की नीलगाय शब्द का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए . बल्कि उसकी जगह घोड़परास और नील बकरी जैसे शब्द बोलना चाहिए . उप मुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने स्पीकर प्रेम कुमार से खास अपील की कि इसे ध्यान में रखा जाय .
दरअसल, बिहार में किसानों के फसलों को बर्बाद करने वाले नीलगाय, जिसे घोड़परास भी कहा जाता है, के मुद्दे पर प्रश्नकाल में कई सदस्य ने सवाल उठाए. सरकार की ओर से घोड़परास के नियंत्रण को लेकर जवाब दिया गया. उप मुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने बताया कि वे भी कृषि मंत्री रह चुके हैं और उन्होंने घोड़परास के मुद्दे पर गम्भीरता दिखाई थी. इस बीच उन्होंने सदन के सदस्यों और स्पीकर से खास अपील की कि नीलगाय शब्द का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए बल्कि उसकी जगह घोड़परास और नील बकरी शब्द का प्रयोग करें. उन्होंने कहा कि नीलगाय बोलने से कई लोगों की भावनाएं इससे जुड़ जाती हैं इसलिए इसकी जगह घोड़परास और नील बकरी शब्द का प्रयोग होना चाहिए.
अब आपको बता दें कि आखिर सरकार के नील गाय की जगह घोड़परास और नील बकरी का नाम रखने के पीछे की वजह क्या है . असल में नीलगाय को भारत में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत संरक्षण प्राप्त है, लेकिन फसल को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचाने वाली नीलगायों को स्थानीय प्रशासन की अनुमति से 'वर्मीन' (हानिकारक जानवर) घोषित कर विशेष परिस्थितियों में मारा जाता है. नीलगाय के शिकार पर 3 से 7 साल तक की जेल और भारी जुर्माना का प्रावधान है . लिहाजा बिहार सरकार ने नील गाय को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत मारने की जगह उसे घोड़परास और नील बकरी के नाम पर मारने का आदेश दे चुकी है . इसके लिए जिलों के जिलाधिकारी ने स्थानीय मुखिया को अपने स्तर से किसानो के फसल बचने के लिए आदेश जारी किया हुआ है . सरकार के नियम के मुताबिक़ एक घोड़परास और नील बकरी को मारने के लिए 750 रुपया शूटर को देने का प्राधान किया है और शूट के बाद उसे मिटटी में गाड़ने के लिए 1250 रूपये दिए जाते हैं . जबकि जंगली सूवर को भी मारने के लिए 750 रुपया और उसे दफ़नाने के लिए 750 रूपये देने का प्रावधान है . बिहार सरकार भले ही नील गाय नाम का इस्तेमाल नहीं करना चाहती पर विधान सभा के तारांकित प्रशनो की सूची में इसे 'नीलगायों से मुक्ति ही छप चुकी है .
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