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SC ने पहली बार इच्छा मृत्यु को दी मंजूरी; हरिश राणा के माता-पिता ने गुहार लगाई
KKKRISNDEV KUMAR
Mar 11, 2026 07:50:20
Noida, Uttar Pradesh
Detailed story SC ने पहली बार इच्छा मृत्यु को दी मंजूरी,13 से अचेत पड़े शख्स के माता पिता ने लगाई थी गुहार सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार अपने फैसले के ज़रिए किसी व्यक्ति को पैसिव युथनेसिया (इच्छा मृत्यु) की इजाजत दी है। कोर्ट ने पिछले करीब 13 साल से अचेत अवस्था में बिस्तर पर पड़े रहने को मजबूर गाजियाबाद के हरीश राणा को पैसिव युथनेसिया की इजाज़त दी है। कोर्ट ने हरीश राणा को जीवित रख रहे मेडिकल सपोर्ट ट्रीटमेंट को हटाने की इजाज़त दे दी है। सुप्रीम कोर्ट ने AIIMS को निर्देश दिया कि मरीज को पैलिएटिव केयर में भर्ती किया जाए, ताकि चिकित्सा उपचार को उचित तरीके से हटाया जा सके और मरीज की गरिमा भी बनी रहे। SC ने माता-पिता की भी तारीफ की 100 फीसदी दिव्यांगता के शिकार अपने बेटे के ठीक होने की उम्मीद छोड़ चुके हरीश के मातापिता ने ही उसे इच्छा मृत्य की मांग की है। इस प्रकिया में मरीज को जीवित रखने वाले आर्टिफिशियल सपोर्ट को हटाकर उसे मरने दिया जाता है। आज कोर्ट ने अपने फैसले में हरीश राणा के माता-पिता की सराहना भी की। कोर्ट ने कहा कि उन्होंने इन सालों में अपने बेटे की बहुत प्यार से देखभाल की है। जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि किसी से सच्चा प्रेम करने का मतलब होता है कि सबसे कठिन समय में भी उसकी देखभाल की जाए।यह बात हरीश के घरवालों पर खरी उतरती है।उनके परिवार ने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा। क्या था हरीश का केस चंडीगढ़ में रह कर पढ़ाई कर रहे हरीश 2013 में अपने पेइंग गेस्ट हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे।इससे उनके सिर में गंभीर चोटें आईं।उसके बाद से वह लगातार बिस्तर में अचेत हालत में है। बिस्तर पर पडे रहने के कारण उनके शरीर पर घाव बन गए थे।लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम के जरिए उन्हें जीवित रखा जा रहा था। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में गाजियाबाद के जिला अस्पताल और एम्स से भी रिपोर्ट मांगी थी दोनो ही रिपोर्ट में कहा गया था कि हर Representation से हालत खराब है। कोर्ट ने कहा कि हमारे लिए बड़ा मुश्किल फैसला होगा पर हम इस लड़के को यूँ अपार दुःख में नहीं रख सकते। कोर्ट ने फैसला लेने से पहले हरिश के घरवालों से अलग से चैम्बर में भी बात की थी। 2018 का फैसला बना आधार आज कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हरिश राणा के इलाज से कोई सुधार नहीं हो रहा है।वह अपनी रोज़मर्रा की सभी ज़रूरतों के लिए पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हैं।उन्हें CAN (डॉक्टरों की मदद से ट्यूब के जरिए दिया जाने वाला खाना-पानी) दिया जा रहा है। ऐसी सूरत में सुप्रीम कोर्ट के 2018 में दिए कॉमन कॉज बनाम भारत सरकार के मामले में दिए फैसले के मुताबिक मेडिकल बोर्ड को जीवन-रक्षक इलाज हटाने के बारे में फैसला करने का अधिकार है।साल 2018 में 5 जजों की संविधान पीठ ने पैसिव युथनेसिया और लिविंग विल को मान्यता दी थी।उस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में गरिमा के साथ जीने का अधिकार भी शामिल है।इसमे यह बात भी शामिल है कि यदि कोई व्यक्ति लाइलाज बीमारी से पीड़ित हो और ठीक होने की कोई उम्मीद न हो, तो उनकी मृत्यु की प्रक्रिया को सम्मानजनक और शांतिपूर्ण बनाया जाए। इस फैसले के बाद यह पहला मामला है, जब सुप्रीम कोर्ट ने इच्छा मृत्यु की इजाज़त दी। कोर्ट ने कहा कि मरीज के माता-पिता, प्राइमरी और सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड सभी इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि मरीज को दिया ट्यूब के जरिए दिया जाने वाला खाना/ इलाज बंद कर देना चाहिए क्योंकि यह मरीज के हित में नहीं है। भविष्य के लिए कोर्ट के निर्देश सुप्रीम कोर्ट के आज के फैसले से भविष्य में इस तरह के मामलों में पैसिव युथनेसिया का रास्ता खुलेगा। सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि केंद्र सरकार इस विषय पर एक व्यापक कानून बनाए। सभी हाई कोर्ट ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट को निर्देश दें कि वे मेडिकल बोर्ड की इलाज हटाने के फैसले की सूचना प्राप्त करें। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि हर जिले में मुख्य चिकित्सा अधिकारी को सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड के लिए डॉक्टरों का एक पैनल रखने को कहे.
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