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आख़िरी फैसला: केजरीवाल-सीसोड़िया आरोपमुक्त, CBI पर सवालों की बौछार
SSSanjay Sharma
Feb 27, 2026 13:52:34
Noida, Uttar Pradesh
कोर्ट ने आखिरी केजरीवाल , सिसोदिया, और बाकी को आरोप मुक्त क्यों किया, जानिए फैसले की अहम बातें
स्पेशल जज जितेंद्र सिंह ने अपने आदेश में केजरीवाल,मनीष सिसोदिया समेत 23 लोगों को आरोप मुक्त करते हुए CBI के जांच के तरीके और कोर्ट में रखे गए केस की विश्वसनीयता पर कई सवाल खड़े किए है। 598 पेज के फैसले के जज ने अपने निष्कर्ष के अंत में जज ने मार्टिन लूथर किंग के उस कथन का हवाला दिया कि अन्याय कहीं भी हो, वो हर जगह न्याय के लिए खतरा है
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है:-
* *दो महीने तक केस के पूरे रिकॉर्ड और 300 अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान और सभी पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट का मानना है कि इस मामले में आरोपियों की भूमिका को लेकर गहरे संदेह की बात तो छोड़िए, CBI का केस उनके खिलाफ पहली नज़र में भी संदेह पैदा नहीं करता।
* *आबकारी नीति को लेकर CBI की थ्योरी न्यायिक समीक्षा में खरी नहीं उतरती। CBI की आपराधिक साजिश की थ्योरी पूरी तरह से अटकलबाजी पर आधारित है। उसे साबित करने के लिए कोई पुख्ता सबूत नहीं है
*केजरीवाल के खिलाफ यह साबित करने लिए कोई सबूत नहीं है कि उन्होंने रिश्वत ली या दिलवाई। उनके खिलाफ आरोप केवल सह-आरोपियों या गवाहों के बयानों पर आधारित थे। उनके खिलाफ कोई स्वतंत्र और ठोस सबूत नहीं था जो उन्हें किसी साजिश से जोड़ सके।केवल किसी नीति को मंजूरी देना अपराध नहीं है, जब तक बेईमानी या (लाभ देने में बदले घुस लेना) साबित न हो।
* *सिर्फ इस वजह से कि कोई नीति उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं दे पाई, या उस नीति के तहत निजी लोगों ने कानूनी रूप से लाभ कमाया इसे अपने आप में अपराध नहीं माना जा सकता।
अगर किसी आर्थिक या प्रशासनिक फैसले को ईमानदारी से लिया गया हो, तो उसे तब तक अपराध नहीं कहा जा सकता जब तक यह सबित न हों कि उसमें बुरी नीयत, रिश्वत जैसा लेन-देन या पद का दुरुपयोग हुआ है।
* *CBI कोई भी ऐसा सबूत पेश नहीं कर पाई जिससे साबित हो कि 2021-22 में आबकारी नीति लाने का मक़सद साउथ ग्रुप या किसी अन्य को गैरकानूनी फायदा पहुंचाना रहा।इसके उलट रिकॉर्ड दिखाता है कि इस पॉलिसी को पूरी तरह से क़ानूनी प्रकिया के ज़रिए लागू किया गया था। सभी स्टेक होल्डर्स के साथ चर्चा भी की गई थी। क़ानूनी या सवैंधानिक बाध्यता न होने के बाद भी एलजी से भी सुझाव मांगे गए। फ़ाइल नोटिग्स भी दर्शाती है कि इनमें से कुछ सुझावों पर गौर करके उनको शामिल भी किया गया।
* *अगर कोई नीति सोच-विचार कर और कानूनी प्रक्रिया का पालन करके बनाई गई है,तो बाद में उसके लागू होने को अपराध बताना सही नहीं ठहराया जा सकता।
* *बिना पुख्ता सबूतों के आरोपियों को ट्रायल का सामना करने के लिए मज़बूर करना उनके साथ सरासर नाइंसाफ़ी होगी।
* *किसी मुख्य सह आरोपी को सरकारी गवाह बनाते समय उसके बयान को सबूतों की कसौटी पर परखा जाना चाहिए और बयान की सच्चाई सुनिश्चित करने के लिए पॉलीग्राफी जैसे टेस्ट की मदद ली जा सकती है
* *जाँच एजेंसी पहले किसी आरोपी को यह कहकर माफी दिलवाती है कि वह पूरा और सच्चा खुलासा करेगा,फिर उसी व्यक्ति के बयान बार-बार लंबे समय तक दर्ज करती रहती है,ताकि जाँच की कमियाँ भरी जा सकें,और नए लोगों को आरोपी बनाया जा सके। यह ठीक नहीं है।
कोर्ट ने इसको लेकर संजय सिंह का हवाला दिया।कोर्ट ने कहा संजय सिंह का नाम मुख्य चार्जशीट या चार सप्लीमेंट्री चार्जशीट में कहीं नहीं था।उनके खिलाफ CBI ने आबकारी नीति बनाने / लागू करने में कोई भूमिका होने का आरोप नहीं लगाया था। लेकिन बाद मे दिनेश अरोड़ा नाम के एक गवाह ने आखिरी बयान में आरोप लगा दिया कि 1 करोड़ रु संजय सिंह के किसी करीबी सर्वेश मिश्रा को भेजे गए थे
* *कोर्ट ने कहा कि सीबीआई आबकारी नीति मामले में साक्ष्य जुटाने की बजाय आम आदमी पार्टी के चुनाव खर्चों, नेताओं के ठहरने के खर्चों, वालंटियर्स को भुगतान जैसी चीजों पर ध्यान फोकस कर रही थी जो चुनाव खर्च के ऑडिट जैसा है। ऐसा करना विशुद्ध रूप से भारत चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है। सीबीआई का ऐसा करना सिर्फ कानूनी मुद्दा नहीं बल्कि एक संवैधानिक प्रश्न है। यह स्वतंत्रत और निष्पक्ष चुनावों की परिकल्पना पर असर डालता है।
* *कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि आरोपियों से बरामद दस्तावेजों में से केवल उन्हीं को सीबीआई ने *कोर्ट में विश्वसनीय दस्तावेज बताया जो उनके पक्ष में थे, आरोप तय करने के चरण में सारे दस्तावेज *कोर्ट के सामने न रखना प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है।
कोर्ट ने कहा कि जांच एजेन्सी का काम सच्चाई तक पहुंचना है न कि सिर्फ किसी को दोषी साबित करना।
* *जाँच एजेंसी की शक्तियों और व्यक्ति के जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के बीच संतुलन बनाना किसी पर क़ानून की दया नहीं है, बल्कि यह संविधान का स्पष्ट आदेश है।
अगर यह संतुलन बनाए नहीं रखा गया, तो कानून का शासन कमजोर हो सकता है और लोगों का आपराधिक न्याय व्यवस्था पर भरोसा भी कमज़ोर हो जाएगा
कोर्ट ने सीबीआई द्वारा चार्जशीट में "साउथ ग्रुप" शब्द का इस्तेमाल करने पर भी कड़ा एतराज जताया है। कोर्ट ने जांच अधिकारी से पूछा कि यह शब्द किसका आइडिया था। कोर्ट ने कहा कि किसी आरोपी को क्षेत्र के आधार पर चिह्नित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने पूछा कि अगर सीबीआई अगर यह चार्जशीट चेन्नई में दायर की होती तो भी क्या वह इस शब्द का प्रयोग करते?
*स्पेशल जज जितेंद्र सिंह ने अपने फैसले के आखिरी में लिखा कि जब वो आदेश लिख रहे है तो उन्हें मार्टिन लूथर किंग के शब्द बार बार याद आ रहे है कि अन्याय कहीं भी हो ,वो हर जगह न्याय के लिए खतरा है।
क़ानून का पुराना सिद्धांत है कि न्याय होना चाहिए, चाहे आसमान ही क्यों न गिर पड़े।कोर्ट का काम न तो कोई सुविधाजनक परिणाम देना है और न ही किसी प्रचलित नैरेटिव का समर्थन करना है बल्कि कानून का शासन (Rule of Law) को बनाए रखना है, तभी नागरिकों का न्याय व्यवस्था पर विश्वास बना रहता है।
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